Uttarakhand: नैनीताल की सड़कें अब वाहनों का भार सहने लायक नहीं:- उत्तराखंड हाईकोर्ट

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नैनीताल। उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने नैनीताल शहर में लगातार बढ़ते ट्रैफिक के दबाव, लंबे जाम और पार्किंग की विकराल होती समस्या पर बेहद गंभीर रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता एवं न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने जनहित से जुड़े इन विभिन्न मुद्दों पर स्वतः संज्ञान लेकर शुक्रवार को इस मामले की विस्तृत सुनवाई की।

हाई कोर्ट ने इस बदतर स्थिति पर कड़ा संज्ञान लेते हुए नगर पालिका नैनीताल और राज्य सरकार को तीन सप्ताह के भीतर कोर्ट में अपना जवाब दाखिल करने के सख्त निर्देश दिए हैं। मामले की सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने बेहद तीखी टिप्पणी करते हुए कहा कि नैनीताल की संकरी सड़कें और यहां की भौगोलिक परिस्थितियां अब अनियंत्रित संख्या में वाहनों का भार सहने की अनुमति बिल्कुल नहीं देती हैं।

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अदालत ने यह भी रेखांकित किया कि पार्किंग की सीमित व्यवस्था होना भी इस पहाड़ी पर्यटन स्थल की प्रमुख और बुनियादी समस्याओं में से एक बन चुकी है, जिससे आम जनता त्रस्त है और यह मुद्दा भी कोर्ट के समक्ष विचाराधीन है।

वीकेंड पर कई घंटे जाम, अस्पताल पहुंचना भी असंभव

अदालत ने सुनवाई के दौरान चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि यह बात सर्वविदित है कि पर्यटन सीजन और विशेषकर सप्ताह के अंत में नैनीताल आने वाले वाहनों की संख्या कई गुना तक बढ़ जाती है। हजारों पर्यटकों के वाहनों के कारण शहर में कई-कई घंटों तक ट्रैफिक पूरी तरह थमा रहता है। हाई कोर्ट ने चेतावनी देते हुए कहा कि ऐसे हालात में यदि किसी व्यक्ति की तबीयत अचानक बिगड़ जाए, तो उसे समय पर अस्पताल पहुंचाना भी लगभग असंभव हो सकता है।

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शादी से इनकार करना आत्महत्या के लिए उकसाना नहीं: हाई कोर्ट

इसी के साथ उत्तराखंड उच्च न्यायालय से एक अन्य महत्वपूर्ण कानूनी मामले में भी बड़ा और नजीर बनने वाला फैसला सामने आया है। हाई कोर्ट ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान स्पष्ट शब्दों में कहा है कि केवल शादी करने से इनकार कर देना किसी भी सूरत में आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध तब तक नहीं माना जा सकता, जब तक कि इसके पीछे कोई ठोस वजह न हो।

न्यायालय ने अपने आदेश में साफ किया कि जब तक इस बात का कोई प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से अथवा जानबूझकर आत्महत्या के लिए उकसाने का कोई स्पष्ट साक्ष्य न मिले, तब तक इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जाएगा। न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की एकलपीठ के समक्ष इस संवेदनशील आपराधिक पुनरीक्षण याचिका पर सुनवाई पूरी की गई।

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न्यायमूर्ति आलोक मेहरा की एकलपीठ ने मामले की परिस्थितियों और तथ्यों का गहन अध्ययन करने के बाद याचिकाकर्ता की याचिका को पूरी तरह से स्वीकार कर लिया है। इसके साथ ही उच्च न्यायालय ने इस पूरे मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा 14 जनवरी 2021 को तय किए गए सभी आपराधिक आरोपों और सत्र परीक्षण की पूरी कानूनी कार्यवाही को तत्काल प्रभाव से निरस्त कर दिया है।

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