देहरादून। उत्तराखंड की खाली और परती कृषि भूमि पर अब किसान जंगली जड़ी-बूटियों की खेती कर सकेंगे। राज्य सरकार की पहल पर उत्तराखंड गैर-काष्ठ वन उत्पाद तथा हर्बल एवं एरोमा टूरिज्म स्वायत्त सहकारी फेडरेशन ने इसके लिए 11 जिलों में आवेदन प्रक्रिया शुरू कर दी है।
इस महत्वाकांक्षी योजना से हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर को छोड़कर प्रदेश के शेष 11 जिलों के किसानों को सीधा लाभ मिलेगा। योजना के तहत राज्य की पांच हजार वन पंचायतों को जोड़ा जाएगा, जिससे ग्रामीणों की आजीविका को एक मजबूत आधार मिलेगा।
जड़ी-बूटी की खेती के इच्छुक किसानों को 25 अक्टूबर तक अपने निकटतम वन विभाग के कार्यालय में आवेदन करना होगा। पारदर्शी संचालन के लिए फेडरेशन ने सभी 11 जिलों में वन अधिकारियों को नोडल अफसर के रूप में तैनात किया है।
योजना के तहत भूमि व पात्रता के मानकों के अनुसार व्यक्तिगत खेती के लिए किसान के पास न्यूनतम दो हेक्टेयर भूमि होना अनिवार्य है, वहीं सामूहिक खेती के अंतर्गत छोटे किसान समूह बनाकर अधिकतम 30 हेक्टेयर तक आवेदन कर सकते हैं, तथा इसके अलावा स्वयं सहायता समूह, पंजीकृत कंपनियां और सहकारी समितियां भी अन्य पात्र संस्थाओं के रूप में शामिल हो सकती हैं।
उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में बंदरों और सूअरों जैसे जंगली जानवरों के डर से किसान पारंपरिक खेती छोड़ रहे थे। औषधीय और सगंध पौधों की खेती जंगली जानवरों से सुरक्षित रहती है, जिससे किसानों की फसल बर्बाद नहीं होगी। इस योजना से बंजर भूमि का सही उपयोग होगा और किसानों को पारंपरिक चिकित्सा व हर्बल उद्योगों में इस्तेमाल होने वाली जड़ी-बूटियों की खेती से सीधा आर्थिक लाभ मिलेगा।

