देहरादून। राज्य की स्वास्थ्य सेवाएं आखिरकार गर्त में क्यों जा रही हैं? यह सवाल अब सिर्फ आम जनता का नहीं, बल्कि खुद स्वास्थ्य महकमे के चिकित्सकों का भी बनता जा रहा है। अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी, तबादलों को लेकर विवाद, पदोन्नति की लंबित प्रक्रिया और मेडिकल कॉलेजों में लगातार सामने आ रही लापरवाही के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर स्वास्थ्य व्यवस्था को संभालने वाला सिस्टम किस दिशा में जा रहा है?
हालात ऐसे हैं कि स्वास्थ्य विभाग अपनी बदहाली का रोना रो रहा है और व्यवस्था अपनी मनमर्जी से नियमों को तोड़-मरोड़ रही है। जिसे चाहा उसे हटाया, जिसे चाहा वहां तैनात किया और जिसे चाहा उसे सुविधा वाली जगह मिल गई। अगर व्यवस्था नियमों से चल रही होती तो शायद डॉक्टरों के संगठन को अपनी सामान्य मांगों के लिए बार-बार मुख्यमंत्री के दरबार में दस्तक देने की जरूरत ही नहीं पड़ती।
पिछले सप्ताह प्रांतीय चिकित्सा सेवा संघ ने मुख्यमंत्री को एक बार फिर पत्र भेजकर चिकित्सकों के स्थानांतरण और तैनाती को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। संघ का आरोप है कि चिकित्सालयों में रिक्त पदों पर नियुक्ति करने के बजाय असंगत और अनुचित स्थानांतरण किए गए। इतना ही नहीं, स्थानांतरण में संशोधन के बाद भी कई मामलों में समस्या पूरी तरह दूर नहीं हुई।
सबसे गंभीर सवाल बीमार चिकित्सकों की तैनाती को लेकर उठाया गया है। संघ के मुताबिक बीमारियों से ग्रसित चिकित्सकों को भी पर्वतीय क्षेत्रों में स्थानांतरित कर दिया गया है। वहीं दंपति चिकित्सकों को भी अलग-अलग स्थानों पर भेजे जाने से पारिवारिक समस्याएं बढ़ गई हैं। ऐसे मामलों में अब संशोधन की मांग की जा रही है।
संघ ने रिक्त पदों पर डीपीसी यानी विभागीय पदोन्नति समिति की प्रक्रिया प्रत्येक वर्ष कराने की मांग भी उठाई है। सवाल यह है कि जब विभाग में पद खाली हैं तो वर्षों से पदोन्नति की प्रक्रिया क्यों नहीं हो रही? क्या विभाग को चिकित्सकों की कमी दिखाई नहीं देती या फिर व्यवस्था को इससे कोई फर्क नहीं पड़ता?
इसके साथ ही सुगम और दुर्गम क्षेत्रों के निर्धारण को लेकर भी सवाल खड़े हुए हैं। संघ का कहना है कि अल्मोड़ा जिला मुख्यालय, टिहरी जिला मुख्यालय, नैनीताल जिला मुख्यालय और मसूरी नगर क्षेत्र को दुर्गम से सुगम श्रेणी में कर दिया गया है, जबकि पूर्व में ये स्थान दुर्गम श्रेणी में शामिल थे। संघ ने इन्हें दोबारा दुर्गम श्रेणी में रखने की मांग की है।
सबसे दिलचस्प सवाल सेवानिवृत्ति के बाद संविदा पर तैनाती को लेकर है। संघ का कहना है कि कई ऐसे चिकित्सक हैं जिन्हें सेवानिवृत्ति के बाद भी सुगम क्षेत्र में संविदा पर तैनाती मिल रही है, जबकि चिकित्सकों की मांग है कि ऐसी तैनातियां पर्वतीय और दुर्गम क्षेत्रों में की जाएं। अगर अनुभवी चिकित्सकों की सेवाएं जरूरत हैं तो फिर उनकी तैनाती वहां क्यों नहीं की जाती जहां वास्तव में डॉक्टरों की सबसे ज्यादा आवश्यकता है?
इन तमाम सवालों से अंदाजा लगाया जा सकता है कि स्वास्थ्य विभाग के चिकित्सकों का सिस्टम पर भरोसा किस स्थिति में पहुंच चुका है। जब सामान्य और नीतिगत मांगों को लेकर भी डॉक्टरों को मुख्यमंत्री के दरबार में पत्र भेजना पड़े, तब सवाल सिर्फ तबादले का नहीं, बल्कि पूरी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर उठता है।
उधर, दून मेडिकल कॉलेज की व्यवस्थाएं भी लगातार सवालों के घेरे में रही हैं। अस्पताल में लापरवाही, अनियमितताओं और कथित गड़बड़ियों के मामले सामने आते रहे हैं। हर बार मामला सामने आने के बाद जांच बैठाने की कवायद जरूर दिखाई देती है, लेकिन सवाल यही है कि जांच के बाद कार्रवाई कितनी होती है?
कहीं ऐसा तो नहीं कि स्वास्थ्य विभाग में ‘जांच’ ही कार्रवाई का पर्याय बन चुकी है? मामला सामने आया, जांच बैठी और फिर फाइलों में दब गया। इस बीच मरीज परेशान, डॉक्टर असंतुष्ट और सिस्टम अपनी रफ्तार से चलता रहा। राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था में सबसे बड़ी जरूरत मजबूत नेतृत्व, पारदर्शी तबादला नीति और जवाबदेही की है।
अगर डॉक्टरों की तैनाती भी जरूरत के हिसाब से नहीं होगी और मेडिकल कॉलेजों की गड़बड़ियों पर भी सिर्फ जांच का शगूफा छोड़ा जाता रहेगा, तो फिर सवाल उठना स्वाभाविक है आखिर प्रदेश की स्वास्थ्य सेवाओं को बचाएगा कौन और सिस्टम की मनमानी पर लगाम लगाएगा कौन?

