देहरादून। उत्तराखंड में लगातार लग रही जंगल की आग ज्वलनशील प्रजाति के चीड़ के वृक्षों को नुकसान पहुंचाने के बजाय उनके फैलाव का कारण बन रही है। शोधकर्ता ओमप्रकाश सती द्वारा उजागर किए गए हालिया आंकड़ों के मुताबिक, बीते पांच वर्षों में राज्य के वनाग्नि प्रभावित क्षेत्रों में चीड़ का दायरा 8 प्रतिशत तक बढ़ गया है, जबकि बांज के जंगलों में करीब 1 प्रतिशत की गिरावट आई है। इस बदलाव से भविष्य में वनाग्नि के अधिक विकराल रूप लेने और जल स्रोतों के सूखने का गंभीर संकट पैदा हो गया है।
उत्तराखंड वन विभाग, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, वन अनुसंधान संस्थान और कुमाऊं विश्वविद्यालय के संयुक्त सर्वेक्षणों में वनों की बदलती संरचना का यह चित्र सामने आया है। वर्तमान में उत्तराखंड का कुल वन आवरण 24,305 वर्ग किलोमीटर है, जिसमें 4,080 वर्ग किलोमीटर (17%) चीड़ और 3,010 वर्ग किलोमीटर (12%) बांज का क्षेत्र है। करीब छह दशक पहले की स्थिति इसके ठीक उलट थी, जब राज्य के वनों में बांज 17 प्रतिशत और चीड़ 12 प्रतिशत हिस्से में मौजूद था।
वैज्ञानिकों के अनुसार आग से प्रभावित इलाकों में मिट्टी की नमी लगातार घट रही है और तापमान बढ़ रहा है, जिससे बांज के नए पौधे पनप नहीं पा रहे हैं। इसके विपरीत अधिक तापमान और आग को झेलने में सक्षम चीड़ की प्रजाति तेजी से फैल रही है। आग लगने की इस बारंबारता ने राज्य के प्राकृतिक पर्यावरण, जैव विविधता और भूमिगत जल स्रोतों को गहरा नुकसान पहुंचाया है।
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच सालों में वनाग्नि से राज्य का बड़ा वन क्षेत्र प्रभावित हुआ है। वर्ष 2022 में 2425.05 हेक्टेयर, वर्ष 2023 में 3933.55 हेक्टेयर, वर्ष 2024 में 771.66 हेक्टेयर, वर्ष 2025 में 310.95 हेक्टेयर और वर्ष 2026 में अब तक 1560 हेक्टेयर जंगल आग की चपेट में आ चुके हैं। हर साल हजारों हेक्टेयर वन संपदा के जलने से पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ा है।
वनाग्नि के इस प्रकोप से कुमाऊं मंडल की कोसी और सुयाल नदी घाटियों के ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। इसके अलावा मुक्तेश्वर, भवाली-भीमताल के ढलान तथा गंगोलीहाट और बेरीनाग के आसपास के मिश्रित वन क्षेत्रों में बांज के पेड़ तेजी से कम हो रहे हैं, जिससे स्थानीय धारों और प्राकृतिक स्रोतों का जलस्तर घटने लगा है।
गढ़वाल मंडल में भी स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। खिरसू, कोटद्वार-लैंसडाउन के ऊपरी हिस्से, पाबो-थलीसैंण मार्ग, टिहरी व उत्तरकाशी के निचले इलाके इस संकट का सामना कर रहे हैं। चंबा-धनौल्टी की निचली ढलानों, प्रतापनगर क्षेत्र और मंदाकिनी व अलकनंदा घाटियों के मध्यवर्ती ढलान वाले वनों में भी बांज के जंगल लगातार सिकुड़ रहे हैं और चीड़ का विस्तार हो रहा है।

