देहरादून। “अंधा बांटे रेवड़ी, अपने अपनों को दे”-यह कहावत उत्तराखंड के संस्कृति विभाग की मौजूदा तस्वीर पर सवाल खड़े करने वाले कलाकारों के बीच खूब सुनाई दे रही है। आरोप है कि एक तरफ विभाग राज्य की लोककला, लोक संस्कृति और कलाकारों के संरक्षण के बड़े-बड़े दावे करता है, वहीं दूसरी तरफ उन्हीं कलाकारों को अपने मेहनताने के लिए सड़क पर उतरने को मजबूर होना पड़ रहा है। मामला अब मुख्यमंत्री आवास तक पहुंच चुका है।
बीते रोज लोक कलाकार संरक्षण संघ के बैनर तले बड़ी संख्या में लोक कलाकार गांधी पार्क से मुख्यमंत्री आवास की ओर कूच करते नजर आए। हाथों में पारंपरिक वाद्य यंत्र, ढोल-दमाऊं की गूंज और संस्कृति विभाग के खिलाफ नारेबाजी ने राजधानी की सड़कों पर यह सवाल जरूर खड़ा कर दिया कि आखिर प्रदेश की संस्कृति को बचाने वाले कलाकारों को अपना ही भुगतान पाने के लिए आंदोलन क्यों करना पड़ रहा है?
कलाकारों का कहना है कि उन्होंने विभाग के विभिन्न कार्यक्रमों और आयोजनों में अपनी कला का प्रदर्शन किया, लेकिन भुगतान के लिए उन्हें लंबे समय तक इंतजार करना पड़ा। सवाल सीधा है—जिस कलाकार की कला को मंच देकर विभाग अपनी उपलब्धियां गिनाता है, उसी कलाकार की मेहनत का पैसा देने में इतनी देरी क्यों?
मामला इसलिए भी गंभीर हो जाता है क्योंकि दूसरी तरफ विभागीय भुगतान को लेकर आरटीआई के माध्यम से सामने आई जानकारी पर भी सवाल उठ चुके हैं। आरोप है कि पिछले वर्ष 29 अक्टूबर से 9 नवंबर तक आयोजित एक महोत्सव में एक कलाकार को करीब 5.30 लाख रुपये का भुगतान किया गया। इस भुगतान के लिए न तो सामान्य कोटेशन प्रक्रिया अपनाई गई और न ही पारदर्शिता के दूसरे जरूरी पहलुओं को स्पष्ट किया गया।
यही विरोधाभास अब संस्कृति विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर रहा है। एक ओर करोड़ों की योजनाओं और बड़े आयोजनों के जरिए उत्तराखंड की संस्कृति को देश-दुनिया तक पहुंचाने की बातें होती हैं, दूसरी ओर छोटे-छोटे भुगतान के लिए लोक कलाकारों को आंदोलन का रास्ता अपनाना पड़ रहा है।
ढोल की थाप सिर्फ संस्कृति की पहचान नहीं, कलाकार की रोजी-रोटी भी है। लेकिन जब उसी ढोल की थाप मुख्यमंत्री आवास तक पहुंचने लगे तो इसे सिर्फ कलाकारों का प्रदर्शन मानकर नजरअंदाज करना शायद आसान नहीं होगा।
सवाल अब संस्कृति विभाग से है—क्या कलाकारों का भुगतान समय पर करना विभाग की प्राथमिकता है या सिर्फ मंचों पर संस्कृति का प्रदर्शन करना? अगर लोक कलाकार ही अपने हक के लिए भटकते रहेंगे तो फिर संस्कृति संरक्षण के बड़े-बड़े दावों का मतलब क्या रह जाएगा?
अब जरूरत इस बात की है कि विभाग कलाकारों के भुगतान, चयन प्रक्रिया और आयोजनों में किए गए बड़े भुगतानों को लेकर पूरी पारदर्शिता के साथ स्थिति स्पष्ट करे, ताकि यह साफ हो सके कि सरकारी धन के इस्तेमाल में नियम और समान अवसर का कितना पालन हुआ है। फिलहाल कलाकारों के ढोल की गूंज ने संस्कृति विभाग के दावों पर एक बड़ा सवाल जरूर बजा दिया है—“संस्कृति बचाएंगे कैसे, जब कलाकार ही परेशान हैं?”

