देहरादून। उत्तराखंड के राज्यपक्षी ‘हिमालयी मोनाल’ के प्राकृतिक ठिकाने ग्लोबल वार्मिंग और बढ़ते तापमान के कारण लगातार सिकुड़ रहे हैं। हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों द्वारा किए गए ताजा शोध में यह चिंताजनक खुलासा हुआ है। बढ़ते शोर और गर्मी से बचने के लिए मोनाल अब हिमालय की अधिक ऊंचाई वाले इलाकों की ओर पलायन कर रहा है।
शोध के मुताबिक आमतौर पर 3,000 मीटर की ऊंचाई पर रहने वाला मोनाल गर्मियों में कभी-कभार 4,000 मीटर तक दिखाई देता था। हालांकि, अब जलवायु परिवर्तन के चलते यह दुर्लभ पक्षी 5,000 मीटर तक की ऊंचाई पर पहुंचने लगा है। वैज्ञानिकों ने मोनाल के अनुकूल प्राकृतिक आवास में 14 प्रतिशत तक की भारी कमी दर्ज की है, जो इसके अस्तित्व के लिए बड़ा खतरा है।
गढ़वाल विश्वविद्यालय का यह महत्वपूर्ण अध्ययन अंतरराष्ट्रीय शोध पत्रिका ‘साइंटिफिक रिपोर्ट’ जर्नल में प्रकाशित हुआ है। रिपोर्ट के अनुसार, आवास घटने से मोनाल की आबादी में हर साल लगभग 1 प्रतिशत की गिरावट आ रही है। वर्तमान में पूरे हिमालयी क्षेत्र में इसकी संख्या करीब 4 लाख है, जिसमें से उत्तराखंड में लगभग 1.5 लाख मोनाल मौजूद हैं।
सांख्यिकी आंकड़ों के अनुसार, पूरे हिमालय में मोनाल का संभावित अनुकूल पर्यावास करीब 13 लाख वर्ग किलोमीटर में फैला है। इस क्षेत्र में मोनाल का घनत्व 8 से 10 पक्षी प्रति वर्ग किलोमीटर है। इसके बावजूद, तापमान में वृद्धि और जलवायु असंतुलन के कारण इनके रहने योग्य प्राकृतिक हालात तेजी से कम हो रहे हैं।
जलवायु मॉडल के आकलन बताते हैं कि भविष्य में मोनाल के रहने योग्य अनुकूल क्षेत्र और भी सीमित हो जाएंगे। अध्ययन के अनुसार, वर्ष 2041 से 2070 के दौरान अलग-अलग मौसमी परिस्थितियों में इनका अत्यधिक उपयुक्त आवास घटकर महज 7.30 से 11.23 प्रतिशत तक ही रह जाने की आशंका है।
मौसम में आ रहे इस बदलाव का सीधा असर सबसे ठंडे मौसम की बारिश और बर्फबारी के चक्र पर पड़ा है। बर्फ जमने और पिघलने का समय बदलने से मोनाल के भोजन की उपलब्धता और उनके प्रजनन चक्र पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि यह सिलसिला जारी रहा तो पक्षी की जैविक गतिविधियों में गंभीर व्यवधान आ जाएगा।
इस विशेष शोध के लिए उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के 2,400 से 4,000 मीटर की ऊंचाई वाले संवेदनशील क्षेत्रों का अध्ययन किया गया। आंकड़े जुटाने के लिए केदारनाथ वन्यजीव अभयारण्य, नंदा देवी जैवमंडल क्षेत्र और गंगोत्री राष्ट्रीय उद्यान जैसे प्रमुख पर्वतीय इलाकों में गहन सर्वेक्षण किया गया था।

