Uttarakhand: गलत बिल भेजा तो अफसरों की जेब से कटेगा पैसा, लोकपाल ने सुनाए 4 अहम फैसले

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देहरादून। उत्तराखंड विद्युत लोकपाल डीपी गैरोला ने बीपीएल उपभोक्ता को वर्षों तक गलत और संदेहजनक बिजली बिल भेजने के मामले में कड़ा रुख अपनाया है। लोकपाल ने इस वित्तीय नुकसान की भरपाई ऊर्जा निगम के जिम्मेदार अधिकारियों और कर्मचारियों से करने के सख्त आदेश दिए हैं। इसके साथ ही लोकपाल ने उपभोक्ताओं से जुड़ी विभिन्न याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए चार महत्वपूर्ण मामलों में अपना फैसला सुनाया है, जिसका असर प्रदेश के लाखों बिजली उपभोक्ताओं पर पड़ेगा।

उत्तराखंड विद्युत लोकपाल डीपी गैरोला द्वारा सुनाए गए चार मुख्य फैसलों ने राज्य भर में उपभोक्ताओं और विभागीय अधिकारियों के बीच नए नियम और स्पष्टता तय कर दी है। पहले मामले में, उत्तरकाशी के चिन्यालीसौड़ स्थित ढाणकोट गांव निवासी बीपीएल उपभोक्ता मदन लाल को मई 2018 से अक्टूबर 2022 तक लगातार साढ़े चार साल बिना मीटर सही किए गलत बिल भेजे गए थे।

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इस पर लोकपाल ने स्पष्ट किया कि नियमानुसार खराब मीटर पर केवल दो बिल ही जारी किए जा सकते हैं, और फोरम का फैसला बदलते हुए उपभोक्ता को बड़ी राहत दी। साथ ही आदेश दिया कि इस लापरवाही से निगम को हुए वित्तीय नुकसान की पूरी वसूली जिम्मेदार अधिकारियों से की जाए।

दूसरे मामले में, जसपुर स्थित इंडस टावर लिमिटेड के जून-जुलाई 2025 के बिलों में पावर फैक्टर 0.96 से अधिक होने के बावजूद 5,590 रुपये अनुचित शुल्क जोड़ने पर राहत दी गई, जहां निगम द्वारा सुधार के बाद उपभोक्ता का बकाया खत्म होकर निगम पर ही 41,000 रुपये अतिरिक्त निकले।

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अन्य दो मामलों में लोकपाल ने नीतिगत और तकनीकी पहलुओं पर रुख स्पष्ट किया। तीसरे मामले में, काशीपुर के कारगिल युद्ध में घायल पूर्व सैनिक बहादुर सिंह द्वारा 30 सितंबर 2026 को मकान बेचने के बाद उस पर लगे 5 किलोवाट के ‘पीएम सूर्य घर योजना’ रूफटॉप सोलर प्लांट को नए मालिक के नाम ट्रांसफर करने संबंधी याचिका पर लोकपाल ने कहा कि यह एक नीतिगत मामला है, जिस पर सीधे अदालती आदेश जारी नहीं किया जा सकता।

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चौथे मामले में, लक्सर के महराजपुर खुर्द निवासी धरमराज द्वारा स्मार्ट मीटर लगने के बाद बिजली की खपत बढ़ने के खिलाफ दायर याचिका को लोकपाल ने खारिज कर दिया, जिसके बाद उपभोक्ता को 2,17,468 रुपये की निर्धारित धनराशि निगम में जमा करानी होगी। लोकपाल के इन फैसलों से जहां एक ओर लापरवाह अधिकारियों की जवाबदेही तय हुई है, वहीं दूसरी ओर आम उपभोक्ताओं को अपने अधिकारों और विभागीय नियमों के प्रति स्पष्टता मिली है।

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