देहरादून। पिथौरागढ़ और धारचूला में बार-बार आने वाले भूकंप की असल वजह को समझने में वैज्ञानिकों को एक बड़ी सफलता हाथ लगी है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, भूकंप का यह बड़ा संकट टनकपुर से लेकर उत्तर प्रदेश के पीलीभीत तक के भूभाग में फैला हुआ है।
हैदराबाद स्थित सीएसआईआर-एनजीआरआई के वैज्ञानिकों ने पीलीभीत से लेकर तिब्बत सीमा तक 210 किलोमीटर के दायरे में जमीन की गहराई का एक्स-रे कर इस बात की पूरी तदीक की है। यह महत्वपूर्ण अध्ययन प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय जर्नल ‘टेक्टोनोफिजिक्स’ में प्रकाशित हुआ है, जिसके अनुसार पिथौरागढ़ भूकंप के लिहाज से बेहद संवेदनशील जोन फाइव में आता है।
वैज्ञानिकों के इस शोध में खुलासा हुआ है कि जब भारतीय प्लेट हिमालय की ओर नीचे धंसती है, तो अत्यधिक दबाव के कारण वहां की चट्टानों से तरल पदार्थ बाहर निकलता है। यह तरल पदार्थ चट्टानों के बीच ‘ग्रीस’ या ‘ल्यूब्रिकेंट’ की तरह काम करता है, जिससे प्लेटों के टकराने पर चट्टानों में फिसलन पैदा होती है और यह भूकंप का मुख्य कारण बनती है।
इस महत्वपूर्ण अध्ययन को अंजाम देने वाले वैज्ञानिकों के प्रमुख दल में अजय मांगलिक, पवन कुमार, एस. त्यागराजन, मोल्ली डेमुडु, एनएन चक्रवर्ती और एम सुरेश शामिल रहे हैं। वैज्ञानिकों ने यह भी चेतावनी दी है कि इस साल अकेले इस क्षेत्र में मैग्नीट्यूड के 14 से अधिक भूकंप आ चुके हैं, जो भूगर्भीय हलचल की गंभीरता को दर्शाते हैं।
इस आसन्न प्राकृतिक आपदा और भूकंप के संभावित खतरों से निपटने के लिए उत्तराखंड सरकार ने एहतियात के तौर पर एक अनूठी पहल की है। सरकार ने भूकंप पूर्व चेतावनी प्रणाली के परीक्षण और आम जनता में जागरूकता बढ़ाने के लिए अब हर महीने की नौ तारीख को पूर्वाहन 11:00 बजे पूरे राज्य में भूकंप का सायरन बजाने का निर्णय लिया है।
राज्य के मुख्य सचिव आनंद बर्धन ने आपदा प्रबंधन विभाग को इस संबंध में सख्त और आवश्यक निर्देश जारी कर दिए हैं। वहीं, आपदा प्रबंधन सचिव विनोद कुमार सुमन ने जानकारी दी है कि वर्तमान में राज्य के संवेदनशील इलाकों में कुल 169 सेंसर और 112 सायरन पूरी तरह स्थापित किए जा चुके हैं।

