Uttarakhand: 743 करोड़ का भानियावाला-ऋषिकेश फोरलेन प्रोजेक्ट विवादों में, मामला पहुंचा कोर्ट

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देहरादून। उत्तराखंड में भानियावाला-ऋषिकेश फोरलेन सड़क परियोजना को लेकर विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच छिड़ी बहस अब बेहद तेज हो गई है। लगभग 20 किलोमीटर लंबी इस सड़क परियोजना में पेड़ों की कटाई और वन्यजीवों पर पड़ने वाले बुरे असर को लेकर पर्यावरण कार्यकर्ता बिफर गए हैं और वे इस प्रोजेक्ट को रद्द करने की मांग कर रहे हैं। दूसरी ओर, भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण ने साफ किया है कि निर्माण कार्य में वन्यजीवों की सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण को पूरी प्राथमिकता दी जाएगी।

743 करोड़ का प्रोजेक्ट, NHAI का क्या है दावा?

भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के मुताबिक, 743 करोड़ रुपये की भारी-भरकम लागत से बनने वाली इस फोरलेन सड़क का डिजाइन पर्यावरणीय पहलुओं को खास तौर पर ध्यान में रखकर तैयार किया गया है। प्राधिकरण का दावा है कि वन क्षेत्र के अंतर्गत पेड़ों की कटाई कम से कम हो, इसके लिए सड़क की चौड़ाई को एक निश्चित सीमा में ही रखा गया है।

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इसके अलावा, राजाजी नेशनल पार्क से सटे इस इलाके में वन्यजीवों की बे-रोकटोक आवाजाही बनाए रखने के लिए करीब 3.5 किलोमीटर लंबी एक आधुनिक एलिवेटेड रोड बनाई जाएगी। एनएचएआई का कहना है कि वन्यजीवों के सुरक्षित आवागमन के लिए इस फोरलेन मार्ग पर विशेष अंडरपास भी प्रस्तावित किए गए हैं, ताकि वाहनों की रफ्तार के बीच जानवर सुरक्षित रह सकें।

प्रेस क्लब में गरजे पर्यावरणविद, उठाए गंभीर सवाल

प्रोजेक्ट को लेकर एनएचएआई के दावों के उलट पर्यावरण प्रेमियों का गुस्सा सातवें आसमान पर है। देहरादून प्रेस क्लब में आयोजित एक साझा प्रेस कॉन्फ्रेंस में पर्यावरण कार्यकर्ता इरा चौहान ने इस परियोजना पर कड़ा ऐतराज जताया। उन्होंने सीधे तौर पर चेतावनी दी कि इस फोरलेन परियोजना के निर्माण से उत्तराखंड के एक बहुत बड़े वन क्षेत्र को ऐसा नुकसान होगा जिसकी कभी भरपाई नहीं की जा सकेगी।

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प्रेस कॉन्फ्रेंस में मौजूद पर्यावरण कार्यकर्ता हिमांशु अरोड़ा ने इस विवाद में एक और बड़ा अपडेट देते हुए बताया कि ऋषिकेश-भानियावाला फोरलेन सड़क परियोजना का यह पूरा मामला फिलहाल कोर्ट में भी पहुंच चुका है, जिसके कारण इस पर कानूनी नजर बनी हुई है।

मानसून में पेड़ों की कटाई और जमीन हस्तांतरण पर आपत्ति

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वहीं, एसडीएस फाउंडेशन के प्रमुख अनूप नौटियाल ने इस पूरी परियोजना की टाइमिंग और वन भूमि हस्तांतरण की प्रक्रिया पर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने मानसून के इस संवेदनशील सीजन में पेड़ों को काटे जाने की योजना को पूरी तरह गलत बताते हुए इसके औचित्य पर गहरी चिंता व्यक्त की है।

अनूप नौटियाल ने परियोजना के दायरे में आने वाली करीब 50 हजार हेक्टेयर वन भूमि के हस्तांतरण के मुद्दे को भी प्रमुखता से उठाया है। पर्यावरणविदों का सामूहिक रूप से कहना है कि सरकार को इस संवेदनशील वन क्षेत्र और पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने के लिए विकास के इस मॉडल पर दोबारा गंभीरता से विचार करना चाहिए।

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