नगर निगम देहरादून की बोर्ड बैठक में सर्वसम्मति से पास हुए महत्वपूर्ण प्रस्तावों के धरातल पर न उतरने और उन्हें शासन स्तर पर भेजने की बात सामने आने के बाद पार्षदों का गुस्सा फूट पड़ा है। सोमवार को भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस दोनों ही दलों के पार्षदों ने एकजुट होकर मेयर सौरभ थपलियाल से मुलाकात की और अपनी तीव्र नाराजगी दर्ज कराई।
पार्षदों का आरोप है कि बोर्ड बैठक में जिन प्रस्तावों को मंजूरी मिल चुकी है, उन्हें केवल अटकाने और लटकाने के इरादे से अब शासन को भेजने की बात कही जा रही है। आक्रोशित जनप्रतिनिधियों ने निगम प्रशासन को अल्टीमेटम देते हुए साफ शब्दों में कहा है कि अगर अगले तीन दिनों के भीतर इन सभी पास प्रस्तावों पर ठोस कार्रवाई शुरू नहीं की गई, तो वे नगर निगम परिसर में ही अनिश्चितकालीन धरने पर बैठने को मजबूर हो जाएंगे।
कई बड़े प्रस्तावों पर अब तक रुकी है कार्रवाई
इस पूरे विवाद की जड़ दो मई को हुई बोर्ड बैठक है, जिसमें शहर के विकास और कर्मचारियों के हित से जुड़े कई संवेदनशील फैसले लिए गए थे। इस बैठक में पर्यावरण मित्रों का दैनिक मानदेय बढ़ाकर 500 से 800 रुपये प्रतिदिन किए जाने, पार्षदों को मिलने वाले मासिक भत्ते को 25 हजार रुपये प्रति माह करने और शहर की सफाई व्यवस्था को मजबूत करने के लिए 715 नए सफाई कर्मियों की भर्ती करने जैसे महत्वपूर्ण प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास हुए थे।
हालांकि, हफ्तों बीत जाने के बाद भी जब इन फैसलों पर कोई जमीनी काम नहीं हुआ, तो पार्षदों ने इस ढिलाई की वजह तलाशी। तब उन्हें पता चला कि निगम प्रशासन इन सभी फाइलों को शासन की मंजूरी के बाद ही आगे बढ़ाने की तैयारी कर रहा है, जिसके बाद भाजपा पार्षद अमिता सिंह और कांग्रेस पार्षद रॉबिन त्यागी के संयुक्त नेतृत्व में पार्षदों ने एकजुट होकर मेयर को एक मांग पत्र (ज्ञापन) सौंपा।
प्रस्तावों को लेकर आमने-सामने आए मेयर और पार्षद
इस मामले को लेकर नगर निगम के भीतर जनप्रतिनिधियों और प्रशासन के बीच अधिकारों की एक नई जंग छिड़ गई है। पार्षद अमिता सिंह का तर्क है कि जिन प्रस्तावों को बोर्ड पहले ही अपनी मंजूरी दे चुका है और जिनके लिए निगम को सरकार से कोई अतिरिक्त बजट भी नहीं मांगना है, उन्हें शासन के पास भेजने का कोई औचित्य नहीं बनता। वहीं दूसरी तरफ, पार्षद रॉबिन त्यागी ने तीखा रुख अपनाते हुए कहा कि अगर बोर्ड से पास फैसलों को भी मंजूरी के लिए सरकार के पास ही भेजना है, तो ऐसे स्वतंत्र बोर्ड का कोई मतलब नहीं रह जाता और इसे भंग कर दिया जाना चाहिए।
इन आरोपों पर अपना पक्ष रखते हुए मेयर सौरभ थपलियाल ने स्पष्ट किया कि नगर निगम के एक्ट और नियमों के मुताबिक बजट से जुड़े जो भी प्रस्ताव पास होते हैं, उन्हें अंतिम स्वीकृति के लिए शासन को भेजना कानूनी रूप से अनिवार्य है। उन्होंने भरोसा दिलाया कि एक्ट के प्रावधानों के तहत इन मामलों पर कानूनी सलाह लेकर ही पूरी पारदर्शिता के साथ नियमानुसार आगे की कार्रवाई की जाएगी।

