उत्तराखंड पहाड़ी राज्य हैं बेशुमार जंगल, गाढ-गदेरे और नदियां होने के बावजूद आज उत्तराखंड सूरज की गरमी से तप रहा है। दरअसल बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने के लिए अपनाए गए विकास के मॉडल ने कुदरत के जिस्म को जख्मी कर दिया है।
विकास योजनाओं को अमलीजामा पहनाने के लिए उन घावों पर मरहम लगाने की बात तो की जाती है, लेकिन हकीकत, रात गई बात गई वाली ही रहती है। जिसका नतीजा सबके सामने हैं। जंगल कट रहे हैं और धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है जिसका असर ग्लेशियर से लेकर नदियो और समुद्र तक पड़ रहा है।
ग्लोबल वार्मिंग का असर ये है कि पेरिस जैसा शहर में भी पसीने छूट रहे हैं तो उत्तराखंड की भी हालत खराब है। जिसका सीधा असर बिजली आपूर्ति पर पड़ रहा है। उत्तराखंड में बढ़ते तापमान ने बिजली उत्पादन को घुटने के बल बिठा दिया है। बिजली कटौती जारी है और उपभोक्ताओं के पसीने छूट रहे हैं। गरमी इतनी ज्यादा है कि बिजली की डिमांड कम होने का नाम नहीं ले रही है जिसका सीधा असर बिजली सप्लाई पर पड़ रहा है।
ऐसे में राज्य के उपभोक्ताओं से पीक आवर्स में बिजली इस्तमाल में संयम बरतने की अपील की गई है। निवेदन किया जा रहा है कि उपभोक्ता शाम छह बजे से लेकर सुबह छह बजे तक बिजली का किफायती इस्तमाल करें। वाशिंग मशीन,एयर कंडीशन जैसे उपकरणों का इस्तमाल न करें।
हालांकि राज्य के मुख्य सचिव आनन्द बर्धन ने निर्बाध बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने के निर्देश दिए हैं। जिस पर यूपीसीएल ने साहब के सामने शायद यस सर कह कर जबाव दिया है।
खबर है कि यूपीसीएल ने साहब को भारी डिमांड का हवाला देते हुए इफैक्टिव मैनेजमेंट पर काम करने का भरोसा दिया है। बिजली समीक्षा बैठक में मुख्य सचिव को यूपीसीएल ने बताया कि सूबे की जरूरत पूरी करने के लिए दस रुपए प्रति यूनिट पर भी बाजार से बिजली मुहैय्या नहीं हो पा रही है।
बावजूद इसके बिजली आपूर्ति करने की पूरी कोशिश की जा रही है। हालांकि अभी केद्रीय पूल से ढाई सौ मेगावाट के अलावा डेढ सौ मेगावाट बिजली की व्यवस्था की गई है। तब जाकर काम चल रहा है। बहरहाल जरूरत है पर्यावरण के मिज़ाज को समझने की उसे सहेजने की और बिजली उत्पादन के नए तरीकों पर काम करने की ताकि आने वाले सालों में गरमी का मौसम परेशान न करे। ।

