आज देश भारत माता के महान क्रांतिकारी सपूत रासबिहारी बोस को उनकी जयंती पर नमन कर रहा है। उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने भी रासबिहारी बोस को उनकी जयंती पर याद किया और भावभीनी श्रद्धाजलि अर्पित की। सीएम धामी ने अपने फेसबुक पेज पर पोस्ट अपलोड करते हुए लिखा-“महान क्रांतिकारी, आज़ाद हिन्द फौज के संगठनकर्ता राष्ट्रभक्त रास बिहारी बोस जी की जयंती पर सादर नमन। मातृभूमि की स्वतंत्रता के लिए आपका अद्वितीय संघर्ष, दूरदर्शी नेतृत्व और समर्पण भारतीय इतिहास में सदैव स्वर्ण अक्षरों में अंकित रहेगा।”

गौरतलब है कि बंगाल में जन्म लेने वाले रासबिहारी बोस का उत्तराखंड के देहरादून से भी नाता था। दरअसल कभी रासबिहारी बोस देहरादून के फॉरेस्ट रिसर्च सेंटर में क्लर्क की नौकरी करते थे।
बहरहाल वो तारीख भी 25 मई ही थी जिस दिन भारत माता के अमर सपूत रास बिहारी बोस ने बंगाल के बर्धमान जिले में रहने वाले एक कायस्थ परिवार में जन्म लिया था। हालांकि साल था 1886…। रासबिहारी बोस का दिल बचपन से ही आजादी की धड़कन लिए धड़कता था। स्कूल जाते ही वे भारत मां की आजादी का स्वप्न बुनने लगे थे। जबकि तकरीबन इक्कीस साल की युवा उम्र में ही क्रांतिकारी गतिविधियों से जुड़ गए थे।
रासबिहारी बोस ने अपने क्रांतिक्रारी साथी बसंत कुमार विश्वास के साथ तात्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड चार्ल्स हार्डिंग की हत्या करने का प्लान भी बनाया था। हालाकि लार्ड हार्डिंग, किस्मत के धनी निकले और बम विस्फोट में बच गए। दरअसल 23 दिसंबर 1912 को लार्ड चार्ल्स हार्डिंग पहली बार कोलकाता आने वाले थे। वैसे तो बम फेंकने की जिम्मेदारी बंगाल के युवा क्रांतिकारी बसंत कुमार विश्वास को दी गई थी क्योंकि बसंत ऊंची कद काठी के थे और लार्ड हार्डिग हाथी पर सवार होकर आने वाले थे।
खैर जब गवर्नर जनरल की सवारी निकली तो चांदनी चौक पर रास बिहारी और बसंत कुमार पहले से मौजूद थे। बम फेंका गया और जोरदार विस्फोट से इलाके में भगदड़ मच गई। सभी को लगा कि बम धमाके में लार्ड हॉर्डिंग की मौत हो गई, लेकिन ऐसा हुआ नहीं । हार्डिंग घायल हुए लेकिन उनका हाथी मारा गया। रास बिहारी बोस की ये कोशिश नाकाम हुई। इसके तुरंत बाद वो बोस देहरादून अपने दफ्तर फॉरेस्ट रिसर्च सेंटर लौट आए और सुबह ऑफिस जाकर पहले की तरह काम करने लगे।
बोस उस समय फॉरेस्ट रिसर्च सेंटर, देहरादून में क्लर्क की नौकरी करते थे। हार्डिंग की जान को खतरा देखकर अंग्रेजी हुकूमत ने क्रांतिकारियों की धरपकड़ शुरू कर दी। गिरफ्तारी का खतरा देख बोस जापान चले गए। लेकिन अंग्रेज सरकार उनके पीछे पड़ गई। इस दौरान बोस ने जापान में 17 ठिकाने बदले। उन्हें जापान के एक ताकतवर नेता ने अपने घर में छुपाया था। आजाद हिंद फौज को बनाने में भी रास बिहारी बोस का बड़ा योगदान था।
दरअसल रास बिहारी बोस इंडियन इंडिपेंडेस लीग के अध्यक्ष थे। साल 1943 में सुभाष चंद्र बोस भारत छोड़कर जर्मनी पहुंचे। उधर भारत की आजादी के दीवाने रास बिहारी ने सुभाष चंद्र को बैंकॉक लीग की दूसरी कॉन्फ्रेंस में हिस्सा लेने बुलाया और 20 जून को सुभाष चंद्र बोस टोक्यो पहुंच गए। जहां 5 जुलाई को नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जोरदार स्वागत हुआ। यही रासबिहारी बोस ने नेता जी को इंडियन इंडिपेंडेस लीग और इंडियन नेशनल आर्मी की कमान सौंप दी।
जबकि खुद रास बिहारी बोस सुभाष बाबू के सलाहकार की भूमिका का निर्वहन करने लगे। 21 जनवरी 1945 को भारत मां के अमर सपूत रास बिहारी बोस का जापान में निधन हो गया। जापान सरकार ने रास बिहारी बोस को ऑर्डर ऑफ द राइजिंग सन से सम्मानित किया था, जो जापान सरकार का दूसरा बड़ा सम्मान है। ऐसे में समाचार 4U भी भारत मां के इस अमर सपूत को उनकी जयंती पर शत-शत नमन करता है।

