पौड़ी में बेकाबू वनाग्नि से 425 हेक्टेयर जंगल खाक, वन विभाग के दावों पर सवाल

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उत्तराखंड के पौड़ी जिले में वनाग्नि की घटनाएं एक गंभीर चुनौती बनकर उभरी हैं, जिसने प्रशासन द्वारा संसाधनों को बढ़ाने के तमाम दावों की पोल खोल दी है। रिपोर्ट के अनुसार, पौड़ी जिला राज्य में वनाग्नि की घटनाओं के मामले में दूसरे नंबर पर आ गया है, जहाँ बीते तीन वर्षों में 325 घटनाएं दर्ज की गई हैं। इन भीषण आग की घटनाओं के कारण लगभग 425 हेक्टेयर क्षेत्र की जैव विविधता को भारी नुकसान पहुंचा है। विडंबना यह है कि आग बुझाने के दावों के बीच वन विभाग में कर्मचारियों की भारी कमी है और कई रेंजों में तो वाहनों तक की सुविधा उपलब्ध नहीं है, जिससे आग पर नियंत्रण पाना और भी कठिन हो गया है।

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वनाग्नि से जैव विविधता को भारी नुकसान

पौड़ी जिले के जंगलों में लगी आग ने न केवल पर्यावरण को क्षति पहुँचाई है, बल्कि यहाँ की जैव विविधता को भी संकट में डाल दिया है। आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2024 और 2025 में पौड़ी वनाग्नि के मामले में प्रदेश के शीर्ष जिलों में शामिल रहा है। विभाग की स्थिति यह है कि सिविल सोयम वन प्रभाग की छह रेंजों में रेंजर के स्थान पर डिप्टी रेंजर तैनात हैं और वन आरक्षियों के दर्जनों पद खाली पड़े हैं। संसाधनों की इस कमी के कारण आग लगने पर समय पर प्रतिक्रिया देना मुश्किल हो जाता है, जिससे आग का दायरा तेजी से फैलता है।

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आग लगने के मुख्य कारण

प्रशासन का दावा है कि वनाग्नि नियंत्रण के लिए पिरुल (चीड़ की पत्तियां) एकत्रीकरण और फायर वाचरों की तैनाती जैसे कई प्रयास किए जा रहे हैं। एनडीआरएफ के माध्यम से भी करोड़ों की राशि वनाग्नि रोकथाम के लिए आवंटित की गई है, जिसमें वन कर्मियों को फायर सूट और अन्य उपकरण देना शामिल है। हालांकि, विशेषज्ञों और अधिकारियों का मानना है कि जंगलों में आग लगने का मुख्य कारण मानवीय हस्तक्षेप और लापरवाही है, जैसे खेतों की सफाई के दौरान आग लगाना या शरारती तत्वों द्वारा जानबूझकर आग लगा देना। चीड़ के जंगलों की अधिकता और शुष्कता भी इस समस्या को और अधिक भयावह बना देती है।

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