Uttarakhand-Lucknow: सीएम योगी से मिले त्रिवेंद्र सिंह रावत, बड़ी चर्चा

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देहरादून। हरिद्वार लोकसभा सीट से भारतीय जनता पार्टी के सांसद त्रिवेंद्र सिंह रावत ने उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से एक महत्वपूर्ण शिष्टाचार भेंट की है। 29 जून को हुई इस बैठक के दौरान दोनों बड़े नेताओं के बीच ग्रामीण भारत की तस्वीर बदलने वाले ‘गो-आधारित जैव-अर्थव्यवस्था’ मॉडल पर गहन मंथन हुआ। सांसद रावत ने मुख्यमंत्री के सामने गोबर के नवोन्मेषी और वैज्ञानिक उपयोग का पूरा खाका रखा।

त्रिवेंद्र सिंह रावत ने चर्चा के दौरान स्पष्ट किया कि गो-आधारित यह नया आर्थिक मॉडल आने वाले समय में ‘विकसित भारत-2047’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के राष्ट्रीय संकल्प को पूरा करने में एक नई शक्ति के रूप में उभरेगा। इस मुलाकात के दौरान दोनों नेताओं ने मुख्य रूप से ग्रामीण अर्थव्यवस्था को आर्थिक रूप से मजबूत और आत्मनिर्भर बनाने के उपायों पर ही विचार-विमर्श किया।

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गोबर से बनेगा ईंधन और खाद, गांवों में मिलेगा स्वरोजगार

सांसद रावत ने बताया कि गोबर आधारित वैज्ञानिक नवाचारों के तहत बड़े स्तर पर काम शुरू करने की जरूरत है। इसके अंतर्गत गोबर से बनने वाले विभिन्न व्यावसायिक उत्पादों, जैव-ऊर्जा, जैविक खाद और निर्माण सामग्री के उत्पादन पर जोर दिया जा रहा है। जब गांवों में इन उत्पादों का निर्माण बड़े पैमाने पर होगा, तो स्थानीय स्तर पर स्वरोजगार के बंपर अवसर पैदा होंगे।

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इस नए बिजनेस मॉडल का सीधा फायदा ग्रामीण युवाओं और देश के किसानों को मिलेगा। गोबर की व्यावसायिक खरीद और जैविक खेती को बढ़ावा मिलने से किसानों की आय में सीधे तौर पर बड़ी वृद्धि देखी जा सकेगी। इससे न सिर्फ खेती की लागत कम होगी, बल्कि पूरी ग्रामीण अर्थव्यवस्था को एक नई रफ्तार मिलेगी।

खत्म होगी आवारा पशुओं की समस्या, आत्मनिर्भर बनेंगी गौशालाएं

सीएम योगी के साथ हुई इस बैठक में ग्रामीण इलाकों की सबसे बड़ी मुसीबत यानी ‘आवारा गोवंश’ की समस्या का भी एक स्थायी और वैज्ञानिक समाधान निकाला गया। त्रिवेंद्र सिंह रावत ने कहा कि जब बाजार में गोबर का आर्थिक मूल्य बढ़ेगा, तो पशुपालक अपने गोवंश को लावारिस छोड़ना बंद कर देंगे। हर कोई गोबर से होने वाली कमाई के लिए गायों का संरक्षण शुरू कर देगा।

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गोबर की कीमत तय होने का सबसे बड़ा लाभ देश भर में चल रही गौशालाओं को भी मिलेगा। गोबर की बिक्री और उससे बनने वाले उत्पादों से होने वाली कमाई के जरिए गौशालाएं पूरी तरह से आत्मनिर्भर हो जाएंगी। इससे गोपालन को एक नई आर्थिक शक्ति मिलेगी, जिससे पारंपरिक पशुपालन घाटे का सौदा नहीं रहेगा।

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