हिमालयी और संवेदनशील पहाड़ी क्षेत्रों में सड़क निर्माण की दशकों पुरानी परिपाटी को बदलते हुए केंद्र सरकार ने एक क्रांतिकारी ‘स्लोप फर्स्ट पॉलिसी’ लागू की है. इस नई नीति का मुख्य उद्देश्य पहाड़ों की नींव को मजबूत करना और भूस्खलन जैसी घटनाओं को रोकना है. अब किसी भी सड़क परियोजना में निर्माण कार्य शुरू करने से पहले ढलान का स्थिरीकरण अनिवार्य कर दिया गया है, ताकि मानसून के दौरान होने वाले बड़े नुकसान से बचा जा सके और यात्रियों का सफर सुरक्षित हो सके.
सड़क से पहले सुरक्षित होगी पहाड़ की ढलान
पुरानी व्यवस्था में पहले सड़कें बनाई जाती थीं और सुरक्षा कार्य जैसे रिटेनिंग वॉल का निर्माण बाद में होता था, जिससे पहाड़ की नींव कमजोर हो जाती थी. नई नीति के तहत अब सड़क निर्माण या पहाड़ काटने से पहले रॉक बोल्टिंग, शॉर्टक्रीट और जियो-ग्रिड जैसी आधुनिक तकनीकों से ढलान को सुरक्षित किया जाएगा. विशेषज्ञों का मानना है कि इस वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भूस्खलन का खतरा 80 प्रतिशत तक कम हो सकता है.
ड्रोन और सेंसर से रखी जाएगी पैनी नजर
पहाड़ों की निगरानी के लिए अब आधुनिक तकनीक का सहारा लिया जाएगा. सड़क निर्माण के दौरान पहाड़ की नींव और ढलानों की स्थिति पर ड्रोन और सेंसर के जरिए नजर रखी जाएगी. इससे किसी भी संभावित खतरे का समय रहते पता लगाया जा सकेगा और जान-माल के नुकसान को कम करने में मदद मिलेगी.
जियो-टेक्निकल इंजीनियरिंग पर विशेष जोर
केंद्र सरकार का मानना है कि पहाड़ों पर सड़क बनाना केवल सिविल इंजीनियरिंग का काम नहीं है, बल्कि यह जियो-टेक्निकल इंजीनियरिंग का विषय है. इसके लिए सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने टिहरी हाइड्रो डेवलपमेंट कॉरपोरेशन और भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के साथ समझौता किया है. ये संस्थाएं हर परियोजना की भूगर्भीय जांच करेंगी ताकि सड़कों के साथ-साथ पहाड़ों की उम्र भी बढ़ सके.
नीति बदलने की मुख्य वजह
पिछले पांच वर्षों में उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और सिक्किम जैसे राज्यों में सड़क हादसों और भूस्खलन की घटनाओं में भारी वृद्धि हुई है. आंकड़ों के अनुसार, इन क्षेत्रों में 1,200 नए लैंडस्लाइड जोन बने हैं और हादसों में 3,500 से अधिक लोगों की मौत हुई है. साथ ही, मानसून में सड़कें टूटने और मलबे की सफाई पर हर साल लगभग ₹5,000 करोड़ का आर्थिक नुकसान होता है, जिसे रोकने के लिए यह सख्त कदम उठाया गया है.

