टिहरी झील सरकारो के लिए कमाऊ पुत्री से कम नहीं, देश प्रदेश को बिजली देने के लिए बनाई गई झील से बिजली उत्पादन तो हो ही रहा है साथ ही साथ वॉटर स्पोर्ट्स के जरिए भी राज्य सरकार की कमाई हो रही है। हालांकि अब झील के किनारे भी राज्य सरकार के लिए आमदनी का बड़ा जरिया बनने वाली है। राज्य के पर्यटन मंत्रालय ने इसके लिए जो खाका खींचा था उस पर अमल करना भी शुरू कर दिया है।
टिहरी झील के किनारे रिंग रोड विकसित करने का प्लान बन चुका है। कोटी कलोनी से लेकर डोबरा चांटी तक रिंग रोड बनेगी। माना जा रहा है कि ये रिंग रोड पर्यटन व्यवसाय के लिए रन वे का काम करेगी। पर्यटन का कारोबार ऊची उड़ान भरने में कामयाब होगा।.
हालांकि अब उत्तराखंड सरकार अपने इरादे पर अमल करने जा रही है। इसके लिए झील से सटे मदन नेगी के इलाके को पर्यटन के लिहाज से विकसित किया जा रहा है। सिडकुल ने इसके लिए बाकायदा कंपनियों से आवेदन मांगे हैं। सरकार की मंशा है कि टिहरी झील से सटे मदन नेगी वाले इलाके में मौजूद जमीन को सिडकुल के जरिए पर्यटन के लिहाज से विकसित किया जाए।
कहा जा रहा है कि फिर इस इलाके में पर्यटक गांव, होटल , विला, रिजॉर्ट जैसे संसाधन बनाए जांए ताकि सैर सपाटे के शौकीन झील से खेलने के बाद यहां सुस्ताएं। इतना ही नहीं सरकार का इरादा तो वैलनेस टूरिज्म को बढ़ावा देने का भी है। ताकि पर्यटन से जुड़े विशेषज्ञों को टिहरी झील के आस-पास ही बेहतर काम मिल सके। सरकार का इरादा है कि इस इलाके में बड़े होटल ग्रुप भी निवेश करे ताकि रोजगार की संभावनाएं पैदा हो सकें।
इरादा तो नेक है लेकिन सवाल ये भी है कि सिडकुल यहां जिस जमीन में पर्यटन के लिहाज से ढांचागत सुविधा विकसित करेगा वो जमीन किसकी होगी। कहीं ऐसा तो नहीं कि लैंड पार्सल डेवलप करने के लिए स्थानीय काश्तकार भूमिहीन हो जाएं या उनके चारागाह विकास की सलीब पर टंग जांए। सवाल ये भी है कि स्थानीय धरतीपुत्र को इसकी एवज में क्या मिलेगा। नौकरी, मालिकाना हक या नफा नुकसान में कुछ हिस्सेदारी। या फिर सिर्फ विंडो शॉपिंग का मजा और गॉर्ड की वर्दी

