देहरादून। उत्तराखंड की नौकरशाही में कुछ फाइलें ऐसी होती हैं जो धूल फांकती रहती हैं, जबकि कुछ ऐसी भी होती हैं जो मानो वीआईपी कॉरिडोर से गुजरती हैं। ताजा मामला एक ऐसी ही विवादित कंपनी से जुड़ा है, जिसका नाम कोविड काल में हुए उपकरण खरीद और पीपीई किट आपूर्ति को लेकर खूब सुर्खियों में रहा था। अब एक बार फिर वही कंपनी सरकारी सिस्टम की कृपा-दृष्टि का केंद्र बनी हुई दिखाई दे रही है। कोविड महामारी के दौरान राजधानी देहरादून समेत प्रदेश के कई महत्वपूर्ण अस्पतालों में आईसीयू स्थापित करने का जिम्मा इसी कंपनी को दिया गया था। उस समय कंपनी द्वारा आपूर्ति किए गए उपकरणों और पीपीई किट खरीद में अनियमितताओं के आरोप लगे थे। विपक्ष ने भी सरकार और स्वास्थ्य विभाग को कठघरे में खड़ा किया था। कई सवाल उठे, कई बयान आए, लेकिन वक्त के साथ मामला ठंडे बस्ते में चला गया। मगर हैरानी की बात यह है कि कोविड खत्म हुए पांच साल से ज्यादा का समय गुजर चुका है और जिन आईसीयू को जनता के इलाज के लिए तैयार किया जाना था, उनमें से कई आज भी पूरी तरह संचालित नहीं हो पाए हैं। करोड़ों रुपये की लागत से लगाए गए उपकरण या तो धूल फांक रहे हैं या फिर अस्पतालों के किसी कोने में बंद पड़े हैं। सवाल यह है कि जब परियोजना का अपेक्षित परिणाम ही नहीं मिला तो फिर उसी कंपनी पर एक बार फिर सरकारी भरोसा क्यों बरसाया जा रहा है?
सूत्रों की मानें तो स्वास्थ्य विभाग में उपकरण खरीद से संबंधित एक नई प्रक्रिया के तहत इसी विवादित कंपनी को फिर से मैदान में उतारने की तैयारी की जा रही है। बताया जाता है कि कंपनी को भारत सरकार का उपक्रम बताते हुए उसके पक्ष में फाइल शासन स्तर पर तेजी से आगे बढ़ाई गई। फाइल की रफ्तार देखकर कई अधिकारियों ने भी हैरानी जताई। ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कोई प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं बल्कि मैराथन प्रतियोगिता चल रही हो और लक्ष्य तक सबसे पहले पहुंचना ही मकसद हो। हालांकि हाल के प्रशासनिक बदलावों के बाद इस फाइल की रफ्तार पर कुछ ब्रेक जरूर लगा है। नए अधिकारियों द्वारा मामले की पृष्ठभूमि और कंपनी के पुराने रिकॉर्ड को खंगालने की चर्चा है। इसके चलते फाइल फिलहाल हिचकोले खाती दिखाई दे रही है। लेकिन सिस्टम के भीतर मौजूद कुछ पुराने चेहरे अब भी कंपनी के लिए कवच बने हुए बताए जा रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग के गलियारों में चर्चा है कि कंपनी के पक्षधर कुछ कर्मचारी और अधिकारी आज भी उसके प्रतिनिधियों को भरोसा दिला रहे हैं कि चिंता की कोई बात नहीं, “सिस्टम में अपने लोग अब भी मौजूद हैं।” यही कारण है कि कंपनी से जुड़े लोग पूरी उम्मीद के साथ एक बार फिर सरकारी ठेकों की दौड़ में बने हुए हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ऐसी कौन सी विशेषता है जो इस कंपनी को बार-बार सरकारी कृपा का पात्र बना देती है? क्या विभाग के पास उपकरण खरीद के लिए अन्य विकल्प नहीं हैं? क्या पिछले कार्यों का मूल्यांकन किए बिना ही नए अवसर दिए जा रहे हैं? और यदि पुराने आईसीयू आज तक पूरी तरह संचालित नहीं हो पाए तो उसकी जवाबदेही किसकी तय होगी?
विडंबना यह भी है कि एक तरफ सरकार स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने और पारदर्शिता का दावा करती है, वहीं दूसरी तरफ विवादों से घिरी कंपनियों को लेकर उठ रहे सवाल लगातार सिस्टम की कार्यशैली पर संदेह पैदा कर रहे हैं। लोग भी अब यह जानना चाहते है कि आखिर करोड़ों रुपये के निवेश का लाभ मरीजों तक क्यों नहीं पहुंचा और जिन परियोजनाओं का हिसाब अभी तक साफ नहीं हुआ, उनके लाभार्थियों को फिर मौका देने की जल्दबाजी क्यों दिखाई जा रही है? अब निगाहें नई व्यवस्था और नए अधिकारियों पर टिकी हैं। देखना होगा कि वे पुराने विवादों की फाइल खोलकर जवाबदेही तय करते हैं या फिर यह मामला भी सरकारी फाइलों के ढेर में दबकर रह जाएगा। लेकिन इतना जरूर है कि स्वास्थ्य विभाग में चल रही इस खामोश हलचल ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि आखिर सिस्टम किसके लिए और किसके इशारे पर काम कर रहा है ?

