“सरकारी सिस्टम पर ‘रील’ का राज, रियल लाइफ में जनता नाराज”

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देहरादून। नए भारत की चमचमाती डिजिटल तस्वीर ने अब उत्तराखंड के सरकारी गलियारों का रंग-ढंग भी बदल दिया है। कभी फाइलों में उलझे रहने वाले अफसर अब कैमरे के एंगल, बैकग्राउंड म्यूजिक और सोशल मीडिया की रील्स में ज्यादा दिलचस्पी लेते दिखाई देने लगे हैं। हालात ऐसे हैं कि सरकारी दफ्तरों में काम कम और “कंटेंट क्रिएशन” ज्यादा नजर आने लगा है। नेताओं के बाद अब नौकरशाह भी “लाइक, शेयर और कमेंट” की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाने की होड़ में जुटे हुए हैं।

प्रधानमंत्री Narendra Modi ने देश में डिजिटल कम्युनिकेशन और सेल्फी कल्चर को नई पहचान दी। जनता से जुड़ने के लिए सोशल मीडिया को ताकतवर माध्यम बनाया गया। लेकिन उत्तराखंड में इसका असर कुछ ऐसा हुआ कि नेताओं से ज्यादा अफसरों ने इस ट्रेंड को हाथोंहाथ पकड़ लिया। अब फेसबुक, इंस्टाग्राम और एक्स पर सरकारी विभागों के अफसरों की मौजूदगी किसी सेलिब्रिटी से कम नहीं दिखाई देती। कहीं निरीक्षण की रील, कहीं मीटिंग का सिनेमाई वीडियो, कहीं जनता दरबार की स्लो मोशन एंट्री तो कहीं पौधारोपण तक का ड्रोन शॉट।

दिलचस्प बात यह है कि जो प्रचार-प्रसार राजनीति का अनिवार्य हिस्सा माना जाता था, अब वही नौकरशाहों की नई जरूरत बन गया है। नेताओं का वजूद प्रचार पर टिका होता है। उन्हें जनता के बीच जाना होता है, चुनाव लड़ना होता है और वोट मांगने होते हैं। लेकिन अफसरों का काम सिस्टम चलाना, योजनाओं को जमीन पर उतारना और प्रशासनिक मशीनरी को मजबूत करना होता है। सरकार उन्हें रील बनाकर वायरल होने की तनख्वाह नहीं देती। बावजूद इसके, सोशल मीडिया पर वाहवाही लूटने की होड़ लगातार बढ़ती जा रही है।

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जरा सोशल मीडिया की आभासी दुनिया पर नजर डालिए। पुलिस विभाग से लेकर सचिवालय तक, जिला मुख्यालय से लेकर ब्लॉक स्तर तक हर विभाग का कोई न कोई अफसर आपको कैमरे के सामने एक्टिव दिखाई देगा। कोई खुद को “जनता का सेवक” साबित करने में लगा है तो कोई “सिस्टम का सुपरहीरो” बनने की कोशिश में। कई जगह तो विभागीय पेजों पर अधिकारियों की तस्वीरें इस अंदाज में पेश की जाती हैं मानो किसी फिल्म का पोस्टर रिलीज हो रहा हो।

विडंबना यह है कि जिस दमदार परफॉर्मेंस का प्रदर्शन सोशल मीडिया की रील्स में होता है, उसकी झलक जमीनी हकीकत में बहुत कम दिखाई देती है। अगर वाकई अफसरों का काम उतना ही चुस्त-दुरुस्त होता जितना वीडियो में नजर आता है, तो शायद उत्तराखंड की आधी समस्याएं खत्म हो चुकी होतीं। पहाड़ से लेकर मैदान तक सड़क, स्वास्थ्य, शिक्षा, पानी और भ्रष्टाचार जैसी परेशानियां इतिहास बन चुकी होतीं। लेकिन असलियत यह है कि आम आदमी आज भी सरकारी दफ्तरों के चक्कर काटने को मजबूर है।

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स्थिति यह है कि मुख्यमंत्री Pushkar Singh Dhami को आए दिन अधिकारियों को नसीहत देनी पड़ रही है। कभी वे अफसरों को होमवर्क करके बैठक में आने की सलाह देते हैं, तो कभी जनता से सीधे संवाद बढ़ाने की बात कहते हैं। हाल ही में मुख्यमंत्री ने अधिकारियों को स्पष्ट निर्देश दिए कि शासनादेश पंद्रह दिन के भीतर जारी होने चाहिए और आम आदमी की समस्याओं के समाधान में लापरवाही बर्दाश्त नहीं की जाएगी। ये वही बातें हैं जिन्हें मीडिया ने प्रमुखता से उठाया।

अब बड़ा सवाल यही है कि जब सब कुछ सोशल मीडिया की रीलों में “चकाचक” दिख रहा है तो फिर मुख्यमंत्री को बार-बार अफसरों को चेताने की जरूरत क्यों पड़ रही है? आखिर क्यों जनता की शिकायतें खत्म नहीं हो रहीं? क्यों फाइलें महीनों अटकी रहती हैं? क्यों आम आदमी को छोटे-छोटे कामों के लिए दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं?

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दरअसल, अफसरशाही का एक बड़ा वर्ग अब “इमेज मैनेजमेंट” को प्रशासनिक दक्षता से ज्यादा अहम मानने लगा है। अच्छी रील, शानदार बैकग्राउंड म्यूजिक और तारीफों से भरे कमेंट अब कई अधिकारियों के लिए नई उपलब्धि बनते जा रहे हैं। यही वजह है कि कई बार जमीनी काम से ज्यादा प्राथमिकता सोशल मीडिया प्रजेंस को दी जाती है। अफसरों के आसपास एक ऐसी डिजिटल दुनिया खड़ी हो गई है जहां हर काम “ऐतिहासिक”, हर दौरा “जनहितकारी” और हर मीटिंग “क्रांतिकारी” दिखाई जाती है।

हालांकि प्रशासनिक हलकों में ऐसे अधिकारी भी हैं जो बिना शोर-शराबे के काम करने में विश्वास रखते हैं। वे कैमरे से दूरी बनाकर फील्ड में परिणाम देने को प्राथमिकता देते हैं। लेकिन ऐसे अफसर अब गिने-चुने ही नजर आते हैं। बाकी सिस्टम में “रीलबाजी” का कल्चर तेजी से पैर पसारता दिख रहा है।

बहरहाल, सवाल यही है कि क्या अधिकारी मुख्यमंत्री की सलाह को गंभीरता से लेंगे और सोशल मीडिया की चमक से बाहर निकलकर जमीन पर काम की असली तस्वीर सुधारेंगे? या फिर आने वाले दिनों में भी जनता समस्याओं से जूझती रहेगी और सोशल मीडिया पर “सब बढ़िया है” वाली रीलें ही फ्लैश होती रहेंगी।