उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने राज्य में शारीरिक शिक्षा के शिक्षकों की भर्ती प्रक्रिया शुरू न होने पर कड़ा रुख अपनाते हुए राज्य सरकार से जवाब तलब किया है। बीपीएड और एमपीएड डिग्री धारक बेरोजगारों की याचिका पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने सरकार से पूछा है कि जब कक्षा 1 से 12 तक शारीरिक शिक्षा को अनिवार्य विषय बना दिया गया है, तो शिक्षकों की नियुक्ति के लिए विज्ञप्ति क्यों जारी नहीं की जा रही है। इसके साथ ही, कोर्ट ने राज्य के लैब तकनीशियनों के हक में भी एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए उन्हें वर्ष 2010 से संशोधित वेतनमान देने का आदेश दिया है।
शारीरिक शिक्षा शिक्षकों की भर्ती पर जवाब-तलब
उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति पंकज पुरोहित की एकल पीठ ने राज्य सरकार को शारीरिक शिक्षा शिक्षकों की भर्ती के संबंध में जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि नई शिक्षा नीति 2020 और 2025 की नियमावली के तहत इस विषय को अनिवार्य करने के बावजूद नियुक्तियों के लिए कोई कदम नहीं उठाए जा रहे हैं, जिससे छात्र इस महत्वपूर्ण विषय के ज्ञान से वंचित हैं। इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 29 जून की तिथि तय की गई है।
लैब तकनीशियनों को मिलेगा 2010 से बढ़ा हुआ वेतन
मुख्य न्यायाधीश मनोज कुमार गुप्ता और न्यायमूर्ति सुभाष उपाध्याय की खंडपीठ ने लैब तकनीशियनों को वर्ष 2010 से संशोधित वेतनमान देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल वित्त विभाग की मौखिक आपत्ति वेतन वृद्धि रोकने का पर्याप्त आधार नहीं हो सकती। जब कार्य की प्रकृति और पूर्व का वेतनमान समान था, तो लैब तकनीशियनों को अन्य संबंधित पदों (जैसे डेंटल हाइजीनिस्ट और एक्स-रे तकनीशियन) के समान लाभ न देना तर्कहीन और मनमाना कदम है।
समान कार्य, समान वेतन के सिद्धांत पर जोर
याचिकाकर्ताओं ने अदालत को बताया कि पांचवें और छठे वेतन आयोग के दौरान लैब और एक्स-रे तकनीशियनों का वेतनमान एक समान था। वर्ष 2010 में अन्य पदों का वेतनमान बढ़ाकर 9300-34800 कर दिया गया, लेकिन लैब तकनीशियनों को इससे वंचित रखा गया। कोर्ट ने उनके पक्ष में निर्णय देते हुए इस भेदभाव को खत्म करने का आदेश दिया है।

