उत्तराखंड सरकार हिमालयी क्षेत्रों में प्राकृतिक आपदाओं के जोखिम को कम करने के लिए एक बड़ी पहल करने जा रही है। चमोली जिले में स्थित वसुंधरा झील प्रदेश की पहली ऐसी हिमनद झील बनेगी, जहाँ अत्याधुनिक ‘अर्ली वार्निंग सिस्टम’ और मॉनिटरिंग मैकेनिज्म स्थापित किया जाएगा। वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान के सहयोग से शुरू होने वाले इस प्रोजेक्ट का उद्देश्य ग्लेशियर झीलों के फटने जैसी आपदाओं की पूर्व सूचना देना और जान-माल के नुकसान को रोकना है। मुख्य सचिव आनंद बर्द्धन की अध्यक्षता में हुई बैठक में इस पायलट प्रोजेक्ट और राज्य में भूकंप पूर्व चेतावनी प्रणाली को और मजबूत करने पर विस्तृत चर्चा हुई।
वसुंधरा झील बनेगा ‘मॉडल’ प्रोजेक्ट
सचिव आपदा प्रबंधन विनोद कुमार सुमन के अनुसार, वसुंधरा झील को एक पायलट साइट के रूप में विकसित किया जा रहा है। यहाँ रियल-टाइम मॉनिटरिंग और डिसीजन सपोर्ट सिस्टम लगाया जाएगा। इस मॉडल की सफलता के बाद इसे राज्य की अन्य संवेदनशील ग्लेशियर झीलों पर भी लागू किया जाएगा। इसके तहत पानी के नियंत्रित निकास और झील का जलस्तर कम करने जैसे सुरक्षा उपाय भी किए जाएंगे।
भूकंप की निगरानी के लिए लगेंगे 500 नए सेंसर
राज्य में भूकंप पूर्व चेतावनी प्रणाली को सशक्त बनाने के लिए 500 नए ‘स्ट्रॉन्ग मोशन सेंसर’ लगाए जाएंगे। वर्तमान में राज्य में 169 सेंसर और 112 सायरन पहले से ही काम कर रहे हैं। आईआईटी रुड़की के साथ मिलकर इस प्रणाली के अलर्ट प्रसारण और रखरखाव के लिए साल 2026 तक का एक महत्वपूर्ण समझौता भी किया गया है, ताकि भूकंप आने से पहले लोगों को समय रहते सूचित किया जा सके।
उत्तराखंड में स्थापित होंगी 8 नई वेधशालाएं
भूकंपीय गतिविधियों पर पैनी नजर रखने के लिए राज्य के विभिन्न हिस्सों में 8 नई स्थायी वेधशालाएं स्थापित करने का प्रस्ताव है। ये वेधशालाएं देवप्रयाग, कर्णप्रयाग, रामनगर, बागेश्वर, अल्मोड़ा, केदारनाथ, चकराता और रुड़की में बनाई जाएंगी। वर्तमान में राष्ट्रीय भूकंप विज्ञान केंद्र के तहत देश भर में 167 वेधशालाएं हैं, जिनमें से 8 पहले से ही उत्तराखंड में संचालित हैं। नई वेधशालाओं के बनने से आपदा प्रबंधन की तकनीकी क्षमता और अधिक बढ़ जाएगी।

