उत्तराखंड का रेशम विभाग अब राज्य के बड़े किसानों को रेशम कीटपालन से जोड़ने के लिए एक विशेष योजना पर काम कर रहा है ताकि उनकी आर्थिकी को और मजबूत किया जा सके। विभाग का लक्ष्य है कि किसान अपनी पारंपरिक फसलों के बजाय रेशम उत्पादन को अपनाएं, जिससे वे प्रति वर्ष एक एकड़ भूमि से लगभग दो लाख रुपये तक की शुद्ध आय प्राप्त कर सकें। वर्तमान में प्रदेश में 320 मीट्रिक टन रेशम का उत्पादन हो रहा है और लगभग 10,500 लोग इस व्यवसाय से सीधे जुड़े हुए हैं। बाजार में रेशम की मांग उत्पादन से कहीं अधिक है, जिससे किसानों के लिए बिक्री की कोई समस्या नहीं है और यूपी व पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों से खरीदार यहाँ पहुँच रहे हैं।
अन्य फसलों की तुलना में अधिक मुनाफा
रेशम विभाग ने गन्ना, गेहूं, चावल और सेब जैसी पारंपरिक फसलों के साथ रेशम कीटपालन का एक तुलनात्मक विवरण तैयार किया है। विभाग के अनुसार, एक एकड़ में शहतूती रेशम कीटपालन करने पर करीब 50 हजार रुपये की लागत आती है, जिसके बदले में किसान 400 से 500 किलोग्राम रेशम उत्पादन कर डेढ़ से दो लाख रुपये तक कमा सकते हैं। यह मुनाफा अन्य कई फसलों के मुकाबले काफी बेहतर है।
पर्यावरण के लिए भी है बेहतर
रेशम उत्पादन न केवल आर्थिक रूप से फायदेमंद है, बल्कि यह पर्यावरण की दृष्टि से भी श्रेष्ठ माना जा रहा है। शहतूत के पौधे लगाने से हरियाली बढ़ती है और इस खेती में फर्टिलाइजर या हानिकारक कीटनाशकों का इस्तेमाल नहीं होता है। इससे मिट्टी की गुणवत्ता बनी रहती है और प्रदूषण भी कम होता है।
एग्रो फॉरेस्ट्री से आय में वृद्धि
वर्तमान में कई किसान एग्रो फॉरेस्ट्री के तहत यह कार्य कर रहे हैं, जिसमें प्रति एकड़ लागत मात्र 15 हजार रुपये आती है और वे 60 हजार रुपये तक की आय प्राप्त कर रहे हैं। विभाग की नई योजना का उद्देश्य आधुनिक तकनीकों और बड़े पैमाने पर उत्पादन के जरिए इस आय को कई गुना बढ़ाना है।

