गिरते भू-जल ने बढ़ाई गढ़ी कैंट की प्यास: 5 ट्यूबवेल और 3 टैंक भी नाकाफी

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गंगा, यमुना, अलकनंदा, मंदाकिनी समेत तमाम नदियों का मायका होने के बावजूद उत्तराखंड में कई इलाके प्यासे हैं। इतना ही नहीं देहरादून में जहां सारी सरकारी मशीनरी लाव-लश्कर के साथ बैठी है। उसी देहरादून के गढ़ी कैंट इलाके में. पानी के लिए जिंदगियों को जद्दोजहद करनी पड़ रही है।

एक पखवाड़ा होने को है नलों से पूरा पानी नहीं आया है। काम चलाने के लिए लोगों को टेंकर बुलवाना पड़ रहा है। पानी की किल्लत की वजह है दून में बढ़ती आबादी और तेजी से घटता भूजल स्तर। देहरादून के गढ़ी कैंट इलाके में तकरीबन 35 हजार की आबादी है। जहां ट्यूबवैल से पानी की सप्लाई दी जाती है।

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स्थानीय जनता का कहना है पहले नलों में पानी धीमी रफ्तार से आता था लेकिन पिछले दो हफ्तों से नल से पानी की बूंद भी टपकने को तैयार नहीं है। उधर पानी के लिए जिम्मेदार महकमे के अधिकारियों का कहना है गढ़ क्षेत्र के लिए पांच ट्यूबैल और तीन ओवर हैड टैंक के जरिए पानी की सप्लाई की जाती है। लेकिन बढ़ती गरमी के चलते भूजल स्तर कम रहा है जिससे जलापूर्ति प्रभावति हो रही है।

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सरकारी सिस्टम ऐसा है कि जब प्यास लगेगी तभी कुंआ खुदेगा की तर्ज पर काम करने का प्लान बना रहा है। पहाड़ से मैदान की ओर शिफ्ट होती आबादी को इग्नोर किया जा रहा है जिसका खामियाजा पहाड़ और मैदान दोनो भुगत रहे हैं। मैदानो के संसाधन बढ़ती आबादी के सामने ऊंट के मुंह में जीरे से ज्यादा कुछ नहीं है।

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ऐसे में देखा जाए तो काफी हद तक उसी पलायन का साइड इफैक्ट है।

बहरहाल बताया जा रहा है कि गढ़ी क्षेत्र को पानी की किल्लत से निज़ात दिलाने के लिए रेन वाटर हार्वेस्टिंग और नए बोरवेल पर काम करने का प्लान तैयार किया जा रहा है। ताकि गढ़ी कैंट की प्यास बुझ सके। बहरहाल देखना ये दिलचस्प होगा कि कब तक इस पर अमल होता है। बरसात से पहले काम हो तो वाटर हार्वेस्टिंग के नतीजे अच्छे मिलत

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