देहरादून/हरिद्वार। हरिद्वार इन दिनों कांवड़ यात्रा के रंग में रंगा हुआ है। सड़कों पर कांवड़िए हैं, गंगाजल लेने वालों की भीड़ है और प्रशासन से लेकर पुलिस तक व्यवस्था संभालने में जुटी है। लेकिन इस धार्मिक यात्रा के बीच राजनीतिक और पत्रकारिता के गलियारों में एक दूसरी चर्चा भी खूब तैर रही है। चर्चा देहरादून के कुछ खबरनवीसों की हरिद्वार में बढ़ती आवाजाही को लेकर है। सवाल यह उठ रहा है कि यह दस्तक सिर्फ कांवड़ यात्रा की कवरेज तक सीमित है या फिर इसके पीछे कोई ‘दूसरा खेल’ भी चल रहा है?
राजधानी देहरादून की ‘धमक’ का हरिद्वार में कितना असर है, यह तो संबंधित लोग ही बेहतर बता सकते हैं, लेकिन चर्चाओं का बाजार गर्म है। कहा जा रहा है कि कुछ खबर नवीस हरिद्वार पहुंच रहे हैं और वहां सिस्टम से जुड़े लोगों से नजदीकियां बढ़ा रहे हैं। होटल से लेकर खाने-पीने तक की व्यवस्थाओं को लेकर भी तरह-तरह की बातें सामने आ रही हैं। हालांकि इन चर्चाओं की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन सवाल इतना जरूर है कि आखिर खबर की तलाश में निकले खबरनवीसों की मेजबानी का खर्च कौन उठा रहा है? वैसे पत्रकारिता में मैदान पर उतरना कोई नई बात नहीं है। बड़ी खबर के लिए पत्रकारों का घटनास्थल पर पहुंचना स्वाभाविक है। लेकिन अगर कवरेज के बहाने कुछ और ही चल रहा हो तो फिर सवाल उठना भी लाजिमी है। आखिर खबर और कलाकारी के बीच की दूरी कितनी होनी चाहिए?
मामला इसलिए भी दिलचस्प हो जाता है क्योंकि हरिद्वार में वर्ष 2027 में होने वाले कुंभ की तैयारियों की दिशा में भी आगे बढ़ रहा है। ऐसे में आने वाले समय में हरिद्वार प्रशासन, पुलिस, संत समाज और सरकार से जुड़े तमाम विभागों के लिए खबर नवीसो की भूमिका अहम रहने वाली है।
ऐसे में सवाल सिर्फ इतना है कि हरिद्वार में पहुंच रहे खबरनवीस खबर लेने गए हैं या ‘खबरों के साथ कुछ और’ लेने? अगर सब कुछ पारदर्शी है तो फिर चर्चा से परेशानी कैसी? और अगर पत्रकारिता की आड़ में किसी तरह के लाभ का खेल चल रहा है तो यह पत्रकारिता के लिए भी सवाल है और सिस्टम के लिए भी।

