निजी मेडिकल कॉलेजों को सरकारी फीस के लिए मजबूर नहीं कर सकते, सुप्रीम कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

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सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि निजी मेडिकल कॉलेजों को सरकारी कॉलेजों जैसी कम फीस तय करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता, क्योंकि ऐसा करने से ये स्व-वित्तपोषित संस्थान बंद हो जाएंगे, जबकि देश को डॉक्टरों की सख्त जरूरत है।

जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यह टिप्पणी राजस्थान के निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस संरचना को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज करते हुए की. शीर्ष अदालत ने कहा कि निजी संस्थान अपनी आर्थिक व्यवस्था के आधार पर काम करते हैं; यदि उन्हें सरकारी फीस ढांचे पर चलने के लिए मजबूर किया गया, तो चिकित्सा शिक्षा में उनका योगदान समाप्त हो जाएगा और वे बंद होकर अन्य क्षेत्रों में चले जाएंगे।

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न्यायालय ने यह भी सुझाव दिया कि जो छात्र निजी कॉलेजों की भारी फीस वहन नहीं कर सकते, वे छात्रवृत्ति, आर्थिक सहायता या सरकारी मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश जैसे अन्य विकल्पों को चुन सकते हैं. यह मामला नीट-यूजी परीक्षा देने वाले एक छात्र की याचिका से जुड़ा था, जिसमें राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के उस दिशा-निर्देश का हवाला दिया गया था जिसमें निजी कॉलेजों की 50% सीटों की फीस सरकारी कॉलेजों के बराबर रखने की सिफारिश की गई थी।

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हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि रिकॉर्ड के अनुसार राजस्थान सरकार ने इस ज्ञापन को लागू नहीं किया है और कोर्ट निजी संस्थानों से सरकारी स्तर की फीस की उम्मीद नहीं कर सकता. इस फैसले से साफ हो गया है कि निजी और सरकारी मेडिकल कॉलेजों की फीस संरचना में अंतर बना रहेगा।