देहरादून। राजनीति में याददाश्त भी बड़ी दिलचस्प चीज होती है। जब विपक्ष में होते हैं तो हर छोटी-बड़ी घटना लोकतंत्र पर हमला नजर आती है और सत्ता में आते ही वही मुद्दे व्यवस्था का हिस्सा लगने लगते हैं। इन दिनों देश में पेपर लीक और कुछ अन्य मामलों को लेकर भाजपा सरकार विपक्ष के निशाने पर है।
कांग्रेस समेत तमाम विपक्षी दल सरकार पर लगातार हमलावर हैं। लेकिन जवाबी हमले में भाजपा भी पीछे हटने के मूड में नहीं है। सत्ता पक्ष अब कांग्रेस के लंबे शासनकाल की उन फाइलों को एक-एक कर खोल रहा है, जिनमें देश के चर्चित घोटालों की कहानी दर्ज है।
राजनीतिक गलियारों में अब बहस केवल पेपर लीक तक सीमित नहीं रह गई है। भाजपा नेताओं का कहना है कि आज जो दल नैतिकता और पारदर्शिता की सबसे ज्यादा बातें कर रहे हैं, उनके शासनकाल में भी एक-दो नहीं बल्कि कई बड़े घोटालों के आरोप लगे। कई मामलों में जांच हुई, कुछ में कार्रवाई हुई, कुछ मामलों में अदालतों ने आरोपियों को बरी कर दिया और कुछ विवाद वर्षों तक राजनीतिक हथियार बने रहे।
देश आजाद हुआ तो विकास के साथ-साथ विवादों का दौर भी शुरू हो गया। वर्ष 1948 में सामने आया जीप घोटाला स्वतंत्र भारत के शुरुआती चर्चित मामलों में शामिल रहा। इसके बाद 1957-58 का मुद्रा (LIC) घोटाला देश की संसद तक गूंजा। वर्ष 1971 का नागरवाला कांड और 1981 का ए.आर. अंतुले ट्रस्ट मामला भी राजनीतिक हलकों में लंबे समय तक चर्चा का विषय बना रहा।
लेकिन अगर किसी मामले ने भारतीय राजनीति की दिशा बदल दी तो वह था 1987 का बोफोर्स तोप सौदा। इस एक मुद्दे ने पूरे देश में ऐसा राजनीतिक तूफान खड़ा किया कि सत्ता परिवर्तन तक की कहानी लिखी गई। इसके बाद 1992 का हर्षद मेहता प्रतिभूति घोटाला और 1993 का झारखंड मुक्ति मोर्चा रिश्वत कांड भी देश की राजनीति पर गहरे सवाल छोड़ गए। 1995-96 का यूरिया घोटाला भी लंबे समय तक सुर्खियों में रहा।
यूपीए सरकार के दौर में भी विवादों की कमी नहीं रही। वर्ष 2005 का ऑयल फॉर फूड विवाद, 2008 का चर्चित 2जी स्पेक्ट्रम मामला, 2010 का कॉमनवेल्थ गेम्स घोटाला, आदर्श हाउसिंग सोसायटी प्रकरण, 2012 का कोयला ब्लॉक आवंटन यानी कोलगेट मामला और 2013 का अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर सौदा आज भी राजनीतिक बहसों में बार-बार सामने लाया जाता है।
हालांकि इन मामलों की कानूनी तस्वीर भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। 2जी स्पेक्ट्रम मामले में विशेष सीबीआई अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया। कई अन्य मामलों में भी वर्षों तक चली जांच और अदालती प्रक्रिया के बाद अलग-अलग फैसले सामने आए। यानी हर आरोप अदालत में सिद्ध नहीं हुआ। यही वजह है कि राजनीतिक आरोप और न्यायिक निष्कर्ष हमेशा एक जैसे नहीं रहे।
यही बात अब भाजपा भी जोर-शोर से उठा रही है। पार्टी नेताओं का कहना है कि जिन दलों के शासनकाल में इतने बड़े-बड़े घोटाले चर्चा में रहे, वे आज नैतिकता का प्रमाणपत्र बांटने की कोशिश कर रहे हैं। वहीं विपक्ष का तर्क है कि पुराने मामलों का हवाला देकर वर्तमान सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। जनता आज के सवाल पूछ रही है और जवाब भी आज के ही चाहती है।
सियासी जानकार मानते हैं कि लोकतंत्र में सत्ता से सवाल पूछना विपक्ष का अधिकार है और विपक्ष के इतिहास को याद दिलाना सत्ता का राजनीतिक हथियार। लेकिन चिंता तब बढ़ती है जब बहस तथ्यों से हटकर व्यक्तिगत हमलों, सोशल मीडिया ट्रोलिंग और गाली-गलौज तक पहुंच जाती है। इससे असली मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और राजनीति केवल आरोपों की प्रतियोगिता बनकर रह जाती है।
फिलहाल पेपर लीक को लेकर छिड़ी सियासी लड़ाई अब इतिहास बनाम वर्तमान की जंग में बदल चुकी है। भाजपा अतीत के घोटालों का हिसाब मांग रही है तो विपक्ष वर्तमान की जवाबदेही तय करने पर अड़ा है। ऐसे में राजनीतिक तापमान लगातार बढ़ रहा है और आने वाले दिनों में यह मुद्दा और अधिक गर्माने के आसार हैं।

