रजिस्ट्रेशन नहीं, फिर भी सेवा विस्तार ! स्वास्थ्य विभाग की मेहरबानी या नियमों की विदाई…? विशेषज्ञ डॉक्टरों की आयु 60 से बढ़ा कर 65 का सरकारी आदेश बना मजाक…..

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देहरादून। उत्तराखंड के स्वास्थ्य महकमे में एक बार फिर ऐसा मामला सामने आया है जिसने विभागीय कार्यप्रणाली और नियमों के पालन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सरकार ने विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी को देखते हुए उनकी सेवानिवृत्ति आयु 60 वर्ष से बढ़ाकर 65 वर्ष करने का निर्णय लिया था। मकसद साफ था—अनुभवी विशेषज्ञ डॉक्टरों की सेवाएं लंबे समय तक मरीजों को मिल सकें। लेकिन अब एक ऐसा मामला सामने आया है जिसमें सवाल उठ रहे हैं कि आखिर विशेषज्ञता का आधार क्या है और नियमों की कसौटी पर कौन खरा उतर रहा है? चर्चाओं में आया मामला कोटद्वार चिकित्सालय में तैनात एक चिकित्सक से जुड़ा बताया जा रहा है। मेडिकल काउंसिल रजिस्ट्रार सुधीर पांडे ने बताया कि संबंधित डॉक्टर का एमबीबीएस के रूप में मेडिकल काउंसिल में पंजीकरण तो है, अभी उनके पीजी दस्तावेजों के परीक्षण की प्रक्रिया गतिमान है । वहीं जिस विशेषज्ञता के आधार पर उन्हें सेवा विस्तार दिए जाने की बात कही जा रही है, उसका पंजीकरण अभी तक मेडिकल काउंसिल में दर्ज नहीं है। बताया जा रहा है कि पीजी डिग्री से जुड़े पंजीकरण के लिए मेडिकल काउंसिल ने संबंधित शिक्षण संस्थान को सत्यापन के लिए पत्र भेज रखा है और प्रक्रिया अभी पूर्ण नहीं हुई है।
यहीं से सवालों की लंबी फेहरिस्त शुरू होती है। जब किसी चिकित्सक की विशेषज्ञता का आधिकारिक पंजीकरण ही लंबित है तो फिर उसे विशेषज्ञ चिकित्सक मानते हुए सेवा विस्तार किस आधार पर दिया गया? क्या केवल डिग्री के दावे के आधार पर सेवा विस्तार संभव है या फिर इसके लिए विधिवत पंजीकरण आवश्यक है? स्वास्थ्य विभाग के जानकार भी इस मामले को लेकर अलग-अलग राय दे रहे हैं। मामले को और दिलचस्प बना देता है कोटद्वार चिकित्सालय प्रशासन का पक्ष। अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक (सीएमएस) ने कथित तौर पर यह स्वीकार किया है कि संबंधित चिकित्सक को फिलहाल क्लीनिकल कार्य नहीं दिया जा रहा है। वजह यह बताई गई कि विशेषज्ञता संबंधी पंजीकरण अभी उपलब्ध नहीं है। ऐसे में डॉक्टर से केवल प्रशासनिक कार्य लिए जा रहे हैं। अब यहां एक और बड़ा सवाल खड़ा होता है। यदि डॉक्टर को क्लीनिकल कार्य नहीं दिया जा रहा है, तो फिर उन्हें सेवा विस्तार देने का उद्देश्य क्या था? विशेषज्ञ चिकित्सकों को सेवा विस्तार इसलिए दिया जाता है ताकि वे मरीजों का उपचार कर सकें और स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूती मिल सके। यदि उनसे मरीजों का उपचार ही नहीं कराया जा रहा तो फिर पूरी कवायद का औचित्य क्या है? मामला यहीं खत्म नहीं होता। अस्पताल प्रशासन की ओर से यह भी कहा गया कि संबंधित चिकित्सक को अभी वेतन का भुगतान नहीं किया जा रहा है। यह दावा सुनकर विभाग के भीतर भी कानाफूसी शुरू हो गई है। आखिर ऐसा कौन सा अधिकारी या कर्मचारी होगा जो महीनों तक सरकारी सेवा देता रहे और बदले में वेतन तक न ले? यदि वास्तव में वेतन नहीं दिया जा रहा है तो इसका रिकॉर्ड क्या कहता है और यदि भुगतान हुआ है तो फिर यह बयान क्यों?

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स्वास्थ्य विभाग में यह चर्चा अब तेजी से फैल रही है कि आखिर इस मामले में इतनी उदारता क्यों दिखाई जा रही है। सामान्य परिस्थितियों में किसी कर्मचारी या अधिकारी के दस्तावेजों में मामूली कमी होने पर नियुक्ति, पदोन्नति या सेवा संबंधी लाभ अटक जाते हैं। लेकिन यहां विशेषज्ञता का पंजीकरण ही विवादों में है और फिर भी सेवा विस्तार का लाभ मिल गया।
स्वास्थ्य सेवाओं जैसे संवेदनशील क्षेत्र में नियमों का पालन केवल कागजी औपचारिकता नहीं बल्कि मरीजों की सुरक्षा और व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा विषय है। ऐसे में यह मामला केवल एक डॉक्टर तक सीमित नहीं रह जाता बल्कि पूरी प्रक्रिया की पारदर्शिता पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है।

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अब देखना दिलचस्प होगा कि स्वास्थ्य विभाग इस पूरे मामले में क्या स्थिति स्पष्ट करता है। क्या सेवा विस्तार पूरी तरह नियमों के अनुरूप दिया गया या फिर कहीं न कहीं प्रक्रिया की अनदेखी हुई है? फिलहाल स्वास्थ्य महकमे में यह मामला चर्चा का विषय बना हुआ है और लोग यही पूछ रहे हैं कि आखिर जिस विशेषज्ञता का पंजीकरण ही अधूरा है, उस पर इतनी मेहरबानी क्यों?

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