देहरादून। कोरोना महामारी के दौरान जब पूरा देश जीवन बचाने की जंग लड़ रहा था, तब उत्तराखंड में भी स्वास्थ्य विभाग को अभूतपूर्व अधिकार और संसाधन दिए गए थे। मकसद साफ था—समय रहते संसाधनों की खरीद, अस्पतालों को सशक्त करना और लोगों की जान बचाना। लेकिन अब करीब छह साल बाद स्वास्थ्य विभाग में सामने आए एक नए घटनाक्रम ने कई पुराने सवालों को फिर से जिंदा कर दिया है।
बताया जा रहा है कि कोविड काल के दौरान हुई करोड़ों रुपये की खरीदारी से जुड़ी फाइलें, जिन्हें वर्षों से ढूंढा जा रहा था, अचानक स्वास्थ्य महानिदेशालय परिसर में ही एक अलमारी से बरामद हुई हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ये फाइलें छह साल तक कहां थीं? और यदि महानिदेशालय परिसर में ही थीं तो फिर इन्हें खोजने वाले अधिकारी और कर्मचारी आखिर किस चीज की तलाश कर रहे थे?
सूत्रों के मुताबिक कोविड काल में हुई खरीदारी को लेकर वर्षों से सवाल उठते रहे। सूचना के अधिकार (आरटीआई) के तहत कई आवेदन लगाए गए। प्रथम अपील से लेकर सूचना आयोग तक मामले पहुंचे। आवेदकों ने खरीद प्रक्रिया, भुगतान, आपूर्ति और अनुमोदन से जुड़ी जानकारी मांगी, लेकिन हर बार विभाग की ओर से यही कहा जाता रहा कि संबंधित फाइलें उपलब्ध नहीं हैं या खोजी जा रही हैं।
दिलचस्प बात यह भी है कि विभागीय सूत्र दावा कर रहे हैं कि कई मामलों में ऑडिट के दौरान भी ये फाइलें सामने नहीं लाई गईं। आखिर ऐसा क्यों हुआ, इसका जवाब अभी किसी के पास नहीं है। लेकिन जब वही फाइलें अब अचानक एक अलमारी से निकलकर सामने आ रही हैं तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या फाइलें वास्तव में गुम थीं या फिर उन्हें गुम रखने की कोशिश की जा रही थी?
महानिदेशालय में फाइलों के मिलने को लेकर भी तरह-तरह की चर्चाएं हैं। कुछ लोग इसे प्रशासनिक लापरवाही बता रहे हैं तो कुछ इसे एक सुनियोजित चुप्पी का हिस्सा मान रहे हैं। चर्चा यहां तक है कि जिस अलमारी में ये फाइलें रखी गई थीं, वह वर्षों से परिसर में मौजूद थी, लेकिन किसी ने उसे खोलकर देखने की जरूरत नहीं समझी। अब यह विभागीय उदासीनता थी या फिर किसी अदृश्य दबाव का असर, यह भी जांच का विषय है।
कोविड काल की खरीदारी वैसे भी हमेशा से चर्चा के केंद्र में रही है। उस समय आपदा की स्थिति को देखते हुए सरकार ने विभागों को त्वरित खरीद की विशेष छूट दी थी। कई मामलों में पारंपरिक टेंडर प्रक्रिया को सरल बनाया गया ताकि जरूरी उपकरण, दवाइयां, पीपीई किट, वेंटिलेटर और अन्य संसाधन तत्काल उपलब्ध कराए जा सकें। लेकिन जब नियमों में ढील मिलती है तो जवाबदेही की आवश्यकता और बढ़ जाती है।
अब जब वर्षों बाद फाइलें सामने आई हैं तो माना जा रहा है कि इनमें कई महत्वपूर्ण जानकारियां छिपी हो सकती हैं। खरीदारी किस दर पर हुई, किन कंपनियों को लाभ मिला, किस स्तर पर अनुमोदन दिए गए और भुगतान की प्रक्रिया क्या रही—ऐसे कई सवाल हैं जिनके जवाब इन्हीं फाइलों में दर्ज हो सकते हैं।
विडंबना यह है कि जिन फाइलों को पाने के लिए आरटीआई आवेदक वर्षों तक चक्कर काटते रहे, सूचना आयोग के आदेशों के बाद भी जिनकी जानकारी उपलब्ध नहीं कराई गई, वही फाइलें अब विभाग के भीतर से ही निकल आई हैं। इससे सूचना के अधिकार कानून की प्रभावशीलता और विभागीय पारदर्शिता दोनों पर सवाल खड़े हो रहे हैं।
फिलहाल स्वास्थ्य विभाग के गलियारों में एक ही चर्चा है—क्या यह सिर्फ फाइल मिलने की कहानी है या फिर कोविड काल की खरीदारी से जुड़े किसी बड़े राज का दरवाजा खुलने वाला है? क्योंकि छह साल तक गायब रही फाइलें जब अचानक सामने आती हैं तो सवाल सिर्फ अलमारी पर नहीं उठते, बल्कि पूरी व्यवस्था की कार्यप्रणाली पर खड़े हो जाते हैं।
अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि इन फाइलों की जांच कौन करेगा, इनमें क्या-क्या तथ्य सामने आएंगे और क्या कोविड काल की खरीदारी पर उठते रहे सवालों को आखिरकार जवाब मिल पाएगा या नहीं।

