नैनीताल। सरोवर नगरी नैनीताल में पर्यटन और आबादी का दबाव अपनी चरम सीमा पार कर चुका है। उत्तराखंड पर्यटन विकास बोर्ड और विशेषज्ञों की रिपोर्ट के अनुसार, नैनीताल शहर की वहन क्षमता करीब 20 साल पहले यानी वर्ष 2006 में ही पूरी तरह समाप्त हो चुकी है। इसके बावजूद शहर पर पर्यटकों, वाहनों और निर्माण का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है, जिससे पूरे क्षेत्र के अस्तित्व पर ही गंभीर संकट मंडराने लगा है।
महज 11.73 वर्ग किलोमीटर के दायरे में फैले नैनीताल में वर्ष 2005 में आने वाले पर्यटकों की संख्या करीब 5.18 लाख थी, जो वर्ष 2024 तक बढ़कर 10.24 लाख पहुंच गई। यानी पिछले 19 वर्षों में पर्यटकों की संख्या दोगुनी हो चुकी है। वहीं वर्ष 2011 की जनगणना में यहाँ की स्थायी आबादी 41,377 थी, जो वर्तमान में नगर पालिका के अनुसार बढ़कर लगभग 55 हजार हो चुकी है।
शहर पर क्षमता से अधिक भार पड़ने के कारण जमीन पर भारी दबाव पड़ रहा है, जिससे माल रोड और आसपास की पहाड़ियों में भूस्खलन की घटनाएं तेज हो गई हैं। अगस्त 2018 में लोअर माल रोड का एक बड़ा हिस्सा धंसकर सीधे नैनी झील में समा गया था। इसके बाद फरवरी 2023, सितंबर 2025 और हाल ही में अपर माल रोड में भी गहरी दरारें दर्ज की गई हैं।
बुनियादी ढांचे की बात करें तो नैनीताल में 5,563 आवासीय, 642 व्यावसायिक और 284 सरकारी भवन मौजूद हैं। लगभग 300 होटलों और 200 होमस्टे वाले इस पर्यटन शहर में महज 4,000 वाहनों की पार्किंग व्यवस्था है। पर्यटन सीजन में जब हजारों वाहन शहर में एक साथ प्रवेश करते हैं, तो यातायात और पार्किंग व्यवस्था पूरी तरह चरमरा जाती है।
पर्यटन के इस अनियंत्रित दबाव के कारण शहर में कचरे का प्रबंधन भी बड़ी चुनौती बन गया है। उत्तराखंड प्रशासन अकादमी की रिपोर्ट के अनुसार, सामान्य दिनों में शहर से प्रतिदिन 24.4 मीट्रिक टन ठोस कचरा निकलता है, जो पर्यटन सीजन में बढ़कर 31 मीट्रिक टन हो जाता है। यानी सीजन के दौरान प्रतिदिन 6.6 मीट्रिक टन अतिरिक्त कचरे का बोझ सहन करना पड़ता है।
विश्व पर्यावरण संगठन के पूर्व अध्यक्ष अजय रावत ने चेतावनी दी है कि शहर की कैरिंग कैपेसिटी 2006 में ही खत्म हो चुकी है और नैनी झील के संरक्षण के लिए लगाए गए एरिएशन तथा बायोरेमेडिएट सिस्टम का सही इस्तेमाल न होने से झील का अस्तित्व खतरे में है। वहीं आईआईटी रुड़की के प्रोफेसर योगेन्द्र के अनुसार, पूरे नैनीताल क्षेत्र का तत्काल वैज्ञानिक मास्टर प्लान तैयार कर असुरक्षित और संवेदनशील क्षेत्रों को चिह्नित किया जाना बेहद आवश्यक है।

