नेशनल रिमोट सेंसिंग सेंटर के निदेशक संजय चौहान ने केदारताल झील को लेकर एक महत्वपूर्ण चेतावनी जारी की है। उन्होंने बताया कि समय के साथ केदारताल का आकार लगातार बढ़ रहा है, जिससे यह क्षेत्र बेहद संवेदनशील हो गया है। वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान में पत्रकारों से बातचीत करते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि इसकी नियमित निगरानी और ‘रिस्क प्रोफाइलिंग’ की सख्त जरूरत है। भविष्य में होने वाले किसी भी बड़े खतरे को टालने के लिए राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के साथ मिलकर सुरक्षात्मक कदम उठाने की योजना बनाई जा रही है।
अर्ली वार्निंग सिस्टम और सैटेलाइट तकनीक का उपयोग
ग्लेशियर झीलों के अचानक फटने के खतरों से निपटने के लिए अब आधुनिक तकनीकों का सहारा लिया जा रहा है। निदेशक चौहान के अनुसार, सैटेलाइट तकनीक के जरिए इन झीलों की लगातार निगरानी की जा रही है। वर्तमान में एक ऐसे अर्ली वार्निंग सिस्टम पर काम हो रहा है, जो झील फटने जैसी किसी भी अनहोनी से पहले ही चेतावनी जारी कर देगा, जिससे जान-माल के नुकसान को कम किया जा सके।
हिमालयी राज्यों की 190 झीलें संवेदनशील घोषित
वैज्ञानिकों ने देश के विभिन्न हिमालयी राज्यों में कुल 190 ग्लेशियर झीलों की पहचान की है जो वर्तमान में संवेदनशील श्रेणी में आती हैं। इन सभी झीलों की सूची राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (NDMA) को सौंप दी गई है। उत्तराखंड की केदारताल के साथ-साथ हिमाचल प्रदेश की गेपांग घाट झील को भी अत्यधिक संवेदनशील माना गया है, जिस पर अभी एडवांस स्तर का काम चल रहा है।

