Himalaya क्षेत्र की 676 ग्लेशियर झीलों का क्षेत्रफल हुआ दोगुना, ISRO के सैटेलाइट सर्वे में खुलासा

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देहरादून। नेपाल में हाल ही में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद अब भारतीय हिमालयी क्षेत्र पर भी बड़े प्राकृतिक संकट का खतरा मंडरा रहा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के वर्ष 2026 के नए सैटेलाइट अध्ययन में खुलासा हुआ है कि उच्च हिमालयी एशिया में स्थित ग्लेशियर झीलों का कुल क्षेत्रफल 2016-17 की तुलना में 5.5 प्रतिशत बढ़ गया है।

इसरो के उपग्रह आंकड़ों के विश्लेषण से स्पष्ट हुआ है कि उच्च हिमालयी एशियाई क्षेत्र में दर्ज कुल 31,698 ग्लेशियर झीलों में से 676 झीलों का आकार चिंताजनक रूप से बढ़ा है। सबसे बड़ा खतरा यह है कि इनमें से 130 ग्लेशियर झीलें सीधे तौर पर भारत की सीमा के भीतर स्थित हैं, जो निचले इलाकों में बसी आबादी के लिए बड़ा जोखिम बन सकती हैं।

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भारतीय सीमा में मौजूद इन 130 संवेदनशील झीलों का दायरा देश की तीन प्रमुख नदी प्रणालियों में फैला हुआ है। आंकड़ों के अनुसार इनमें से 65 झीलें सिंधु नदी बेसिन, 7 झीलें गंगा नदी बेसिन और 58 झीलें ब्रह्मपुत्र नदी बेसिन में स्थित हैं। ये झीलें ग्लेशियरों के पिघलने से उनके पीछे प्राकृतिक मलबे या बर्फ के बांधों के जमाव से बनी हैं।

इसरो की 1984 से अब तक की लॉन्ग-टर्म रिपोर्ट के मुताबिक, 10 हेक्टेयर से बड़ी 2,431 झीलों में से 676 झीलों में अभूतपूर्व फैलाव देखा गया है। इनमें से 601 ग्लेशियर झीलों का आकार तो दोगुने से भी ज्यादा हो चुका है। अकेले पूर्वी हिमालय में ही इन झीलों के क्षेत्रफल में 14.1 वर्ग किलोमीटर की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।

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झीलों का बढ़ता आकार और पहाड़ी ढलानों पर भूस्खलन का खतरा मिलकर स्थिति को और गंभीर बना रहा है। इसरो की रिपोर्ट के अनुसार, पूरी हिमालयी रेंज में अब तक 80 हजार से ज्यादा भूस्खलन के मामले दर्ज किए जा चुके हैं। इसरो वर्तमान में मानसून के दौरान NHPC की 26 जलविद्युत परियोजनाओं के जलग्रहण क्षेत्रों में स्थित 2,024 झीलों की सैटेलाइट से लगातार निगरानी कर रहा है।

हिमाचल प्रदेश के लाहुल-स्पीति में स्थित अति-संवेदनशील ‘घेपन घाट झील’ का दायरा पिछले 33 वर्षों में करीब 176 प्रतिशत बढ़ चुका है। वर्तमान में 101.30 हेक्टेयर में फैली इस झील में 35.08 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी मौजूद है। इसके खतरे को देखते हुए केंद्र सरकार यहां पहली बार अर्ली वार्निंग सिस्टम लगाने जा रही है, जिसका ट्रायल सिस्सू झील के पास शुरू हो गया है।

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दूसरी ओर, ऊंचाई पर स्थित इन खतरनाक झीलों की गहराई नापने के लिए आईआईटी मंडी के शोधकर्ताओं ने बड़ी सफलता हासिल की है। वैज्ञानिकों ने मानव रहित रोबोटिक बोट पर ‘सोनार’ तकनीक लगाकर झीलों की गहराई और पानी के आयतन को सटीक रूप से मापने का सुरक्षित तरीका तैयार किया है। ईजीयू जनरल असेंबली 2026 में प्रकाशित यह शोध भविष्य में आपदा प्रबंधन के लिए बेहद मददगार साबित होगा।

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