देहरादून। छह वर्षों के लंबे इंतजार के बाद शुरू हुए भारत-चीन सीमांत व्यापार में गंभीर व्यावहारिक अड़चनें पैदा होने से भारतीय व्यापारियों का भविष्य अधर में लटक गया है। 1 अगस्त को तिब्बत की तकलाकोट मंडी पहुंचे 20 सदस्यों का पहला दल बिना नए सामान के वहां फंसा हुआ है। चीनी प्रशासन की ओर से नए माल और शेष व्यापारियों को भेजने की अनुमति अब तक नहीं मिल पाई है।
मामले की गंभीरता को देखते हुए पिथौरागढ़ के जिलाधिकारी आशीष भटगाईं ने विदेश मंत्रालय को पत्र भेजकर हस्तक्षेप की मांग की है। सीमित अवधि के लिए संचालित होने वाले इस पारंपरिक व्यापार के लिए पिछले चार महीनों से तैयारियों में जुटे कारोबारियों की चिंता लगातार बढ़ती जा रही है।
इस वर्ष धारचूला स्थित व्यापार कार्यालय से कुल 62 व्यापारियों और उनके 92 सहायकों सहित 170 ट्रेड पास जारी किए गए थे। हालांकि, चीन की ओर से अनुमति न मिलने के कारण जहां अधिकांश व्यापारी भारत में ही अटके हैं, वहीं तकलाकोट पहुंचे व्यापारी सामान के अभाव में दुकानों में बैठकर समय काटने को मजबूर हैं।
इस गंभीर संकट की सबसे बड़ी वजह दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व और संबंधित विभागों की ओर से साधी गई चुप्पी है। चीनी प्रशासन स्थिति को स्पष्ट नहीं कर रहा है और न ही भारतीय विदेश मंत्रालय की ओर से अभी तक कोई ठोस कार्रवाई सामने आई है। अंतरराष्ट्रीय मामला होने के कारण जिला प्रशासन और धारचूला ट्रेड कार्यालय पत्राचार करने के बावजूद लाचार नजर आ रहे हैं।
तकलाकोट मंडी पहुंचे भारतीय व्यापारियों के अनुसार, भारत से सामान न पहुंचने के कारण मंडी परिसर में पूरी तरह सन्नाटा पसरा हुआ है। चीनी प्रशासन की तरफ से कोई आधिकारिक संदेश न मिलने से तकलाकोट जाने के लिए तैयार 32 व्यापारियों का अगला दल पूरी तरह असमंजस में है।
व्यापारियों को प्रशासनिक और वित्तीय स्तर पर भी भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। तिब्बत पहुंचे व्यापारियों का कहना है कि ट्रेड पास के आधार पर वहां के बैंकों में उनका खाता नहीं खुल पा रहा है। इसके साथ ही, दुकानों और रहने का एक साल का भारी किराया देने के बावजूद बिक्री शून्य है, जिससे व्यापारियों के सामने बड़ा आर्थिक संकट खड़ा हो गया है।

