कोरोना में जर्मनी से मंगाए कंसंट्रेटर, 4 साल बाद देहरादून की महिला को मिला लाखों की ड्यूटी का नोटिस

ख़बर शेयर करें

1977 में एक फिल्म आई थी अमानत, फिल्म का एक गीत बड़ा मशहूर हुआ था, “मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं,यूं जा रहे हैं जैसे हमें जानते नहीं अपनी गरज थी जब तो लिपटना कबूल था,बाहों के दायरे में सिमटना कबूल था, अब हम मना रहे हैं तो मानते नहीं” कुछ इसी हाल से गुजरना पड़ रहा है देहरादून की सामाजिक कार्यकर्ता रेखा मित्तल को।

दरअसल कोरोना के दौर में ऑक्सीजन की कमी से जूझते तड़फते इंसानों को देख कर रेखा मित्तल का दिल पसीज गया। विदेश में काम करने वाला उनका बेटा भी कोराना के दौर में घर लौट आया। मां ने बेटे से हालात का जिक्र किया बेटे ने भी पीडितों का दर्द महसूस किया और रहमदिल बेटे ने जर्मनी से 16 ऑक्सीजन कंसंट्रेटर मंगवा दिए ताकि दून में कोरोना से तड़फते मरीजों को ऑक्सीजन आसानी से मिल सके।

यह भी पढ़ें -  पौड़ी गढ़वाल को ₹110 करोड़ की सौगात: CM धामी ने किया आधुनिक विज्ञान संग्रहालय का लोकार्पण

रेखा जी की माने तो उन्होंने 16 आक्सीजन कंसट्रेटर में से सात एक कैबिनेट मंत्री और बाकी 9 दूसरे जरूरतमंदों को दिए । कोरोना काल में इस बीमारी से बचाव वाले उपकरण मांगने पर कस्टम ड्यूटी नहीं लग रही थी। लेकिन न जाने क्या हुआ अचानक से उन्हें चार साल बाद कस्टम का नोटिस दो बार आ गया है।

पहले मार्च 26 मे आया फिर मई 26 में आया। नोटिस में 16 ऑक्सीजन कंसंट्रेटर मांगने का जिक्र है जिसके लिए 7.13 लाख की कस्टम ड्यूटी चुकाने को कहा गया है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक रेखा जी को भेजे गए नोटिस में कस्टम ड्यूटी यह कहते हुए लगाई गई है कि ऑक्सीजन कंसंट्रेटर को निजी रूप से इस्तमाल किया गया है।

यह भी पढ़ें -  देहरादून में NEET की तैयारी कर रही 23 वर्षीय छात्रा ने की खुदकुशी, फंदे से लटकता मिला शव

अगर नहीं किया गया तो स्वास्थ्य विभाग की ओर से प्रमाण पत्र सलंग्न करें तभी कस्टम ड्यूटी माफ होगी। मीडिया रिपोर्ट की माने तो रेखा जी को सूबे का स्वास्थ्य महकमा टरका रहा है। क्योंकि सीएमओ दफ्तर के पास रेखा जी के बेटे के जर्मनी से मंगाए गए ऑक्सीजन कंसंट्रेटर का ब्योरा ही दर्ज नहीं है।

हालांकि दोबारा से कागज़ात खंगालने की बात की जा रही है। कहा जा रहा है कि कुछ प्रमाण मिला तो पत्र जारी किया जाएगा। ऐसे में स्वास्थ्य महकमे का ये रवैया रेखा जी की निराशा को बढ़ा रहा है उनके मदद करने के हौसले को तोड़ रहा है। उन्होने सोचा भी नहीं होगा कि मदद की नमाज के चक्कर में कस्टम ड्यूटी का रोजा गले पड़ जाएगा।

यह भी पढ़ें -  गन्ना किसानों के लिए धामी सरकार का बड़ा फैसला: 4 सहकारी चीनी मिलों के लिए 81.47 करोड़ का बजट जारी

बहरहाल सवाल ये है कि रेखा जी की मदद की गवाही वो कैबिनेट मंत्री क्यों नहीं दे रहा है जिसको रेखा जी ने सात विदेशी ऑक्सीजन कंसट्रेटर दिए। ताज्जुब की बात है पत्थरों के शहर में कोई सेंटाक्लॉज आईनो का घर बनाने की पहल करता है लेकिन सिस्टम है कि सेंटा का थैला ही छीन लेता है उसके आईने के घर को लापरवाही के पत्थरों से चकनाचूर कर देता है। इन हालातों में जरूरत है महकमे को पहल करने की ताकि हर आफत में कोई मसीहा मददगार बनने का हौसला जुटा सके।

ADVERTISEMENTS Ad Ad Ad