स्वास्थ्य विभाग सोता रहा, पटवारी बना मरीज तो खुली फर्जी अस्पताल की पोल….!

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उत्तराखंड का स्वास्थ्य महकमा आखिर कब जागेगा? यह सवाल एक बार फिर तब खड़ा हो गया जब ऊधमसिंह नगर जिले के दिनेशपुर स्थित एक निजी अस्पताल में चल रहे कथित गैरकानूनी कारनामों का पर्दाफाश जिला प्रशासन की टीम ने किया। हैरानी की बात यह है कि जिस काम के लिए पूरा स्वास्थ्य विभाग मौजूद है, वह काम आखिरकार जिला प्रशासन को करना पड़ा।

सूत्रों के अनुसार दिनेशपुर के एक निजी अस्पताल के खिलाफ लंबे समय से शिकायतें मिल रही थीं। आरोप थे कि अस्पताल में नियमों को ताक पर रखकर मरीजों का उपचार किया जा रहा है और कई गतिविधियां निर्धारित मानकों के विपरीत संचालित हो रही हैं। शिकायतें लगातार जिला प्रशासन तक पहुंच रही थीं, लेकिन स्वास्थ्य विभाग की ओर से कोई प्रभावी कार्रवाई सामने नहीं आई। मामले की गंभीरता को देखते हुए एसडीएम रिचा सिंह के नेतृत्व में एक जांच टीम गठित की गई। अस्पताल की वास्तविक स्थिति जानने के लिए प्रशासन ने एक अनोखी रणनीति अपनाई। एक पटवारी को मरीज बनाकर अस्पताल भेजा गया। जैसे ही अस्पताल के भीतर की गतिविधियों की जानकारी सामने आई, जांच टीम के सदस्य भी हैरान रह गए। इसके बाद प्रशासनिक टीम ने अस्पताल में छापामार कार्रवाई की और कई गंभीर अनियमितताओं का खुलासा होने की बात सामने आई। कार्रवाई के दौरान स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों को भी टीम में शामिल किया गया, लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जिन शिकायतों के आधार पर यह जांच हुई, उन शिकायतों पर स्वास्थ्य विभाग पहले ही सक्रिय क्यों नहीं हुआ? दरअसल यह मामला केवल एक अस्पताल की अनियमितताओं का नहीं, बल्कि पूरे निगरानी तंत्र की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। सरकार स्वास्थ्य विभाग पर करोड़ों रुपये इसलिए खर्च करती है ताकि निजी अस्पतालों की नियमित निगरानी हो सके और मरीजों के हितों की रक्षा की जा सके। लेकिन हालात ऐसे हैं कि लोगों का भरोसा विभागीय अधिकारियों से उठता जा रहा है। यही वजह है कि आम जनता अब अपनी शिकायतें सीधे जिला प्रशासन और मुख्यमंत्री पोर्टल तक पहुंचा रही है। यदि निचले स्तर पर शिकायतों का समयबद्ध और निष्पक्ष निस्तारण हो जाए तो लोगों को उच्च अधिकारियों और मुख्यमंत्री हेल्पलाइन का दरवाजा खटखटाने की जरूरत ही न पड़े। लेकिन विभागीय उदासीनता ने हालात ऐसे बना दिए हैं कि जनता को न्याय पाने के लिए दूसरी एजेंसियों का सहारा लेना पड़ रहा है। दिनेशपुर का यह मामला स्वास्थ्य विभाग के लिए आईना है। विभाग को आत्ममंथन करना होगा कि आखिर उसकी निगरानी व्यवस्था में ऐसी कौन सी खामियां हैं, जिनके कारण फर्जीवाड़े और अनियमितताओं का खुलासा प्रशासन को करना पड़ रहा है। सवाल सिर्फ एक अस्पताल का नहीं, बल्कि उन हजारों मरीजों की सुरक्षा का है जो निजी अस्पतालों पर भरोसा कर अपना इलाज करवाते हैं।

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