उपनल कर्मियों के समान वेतन मामले में सरकार ने खटखटाया सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा

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उत्तराखंड सरकार राज्य कर विभाग में तैनात उपनल कर्मियों के समान काम, समान वेतन और सेवा संबंधी लाभों के मामले में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का मूड बना लिया है। जिसके लिए हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुज्ञा याचिका दायर करेगी। इसके लिए शासन ने तत्काल राज्य कर विभाग को प्रस्ताव उपलब्ध कराने के निर्देश जारी कर दिए हैं।

आठ जून को शासन स्तर पर हुई उच्च स्तरीय बैठक में यह अहम निर्णय लिया गया। बैठक में न्याय विभाग, वित्त, राज्य कर, कार्मिक और सैनिक कल्याण विभाग के अपर सचिव व वरिष्ठ अधिकारी शामिल हुए. बैठक का उद्देश्य हाईकोर्ट की विभिन्न रिट याचिकाओं में पारित आदेशों के क्रियान्वयन और उपनल कर्मियों के प्रत्यावेदनों का निस्तारण करना था।

राज्य कर विभाग के अंतर्गत कुल 37 रिट याचिकाओं के तहत 116 डेटा एंट्री ऑपरेटर आ रहे हैं. इनमें से 105 कर्मियों ने सचिव के समक्ष अपने प्रत्यावेदन दिए थे. कर्मियों ने नियमितीकरण, कृत्रिम व्यवधान समाप्त करने, समान कार्य के लिए समान वेतन, 10 वर्ष से अधिक की नियमित सेवा के दृष्टिगत एरियर, मानदेय की मांग और सेवा से बाहर किए जाने की अवधि के वेतन का भुगतान मांगा था।

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शासन स्तर पर की गई समीक्षा में विभाग में कार्यरत 96 कर्मियों को चार श्रेणियों में बांटा गया. इसमें सबसे बड़ा पेंच श्रेणी-3 के उन 72 कर्मियों को लेकर फंसा है, जिनकी सेवा में समय-समय पर कृत्रिम व्यवधान रहा है। मतलब इन उपनलकर्मियों की सेवा निरंतर नहीं रही, बीच में ब्रेक आता रहा।

बैठक में स्पष्ट किया गया कि सैनिक कल्याण विभाग के शासनादेश के अनुसार, केवल उन्हीं उपनल कर्मियों को चरणबद्ध रूप से लाभ दिया जा सकता है जो कट-ऑफ डेट 12 नवंबर 2018 तक निरंतर, बिना किसी ब्रेक के विभाग को अपनी सेवाएं देते रहे हों। लेकिन राज्य कर विभाग के 72 कर्मियों की सेवा में कृत्रिम व्यवधान रहा है। ऐसे में इनके प्रत्यावेदनों पर सकारात्मक विचार करना सैनिक कल्याण विभाग की नीति और नियमों का उल्लंघन होगा।

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बैठक में यह बात उठी कि अगर इन 72 कर्मियों को नियम विरुद्ध लाभ दिया गया तो अन्य विभागों से भी ऐसी मांगें उठेंगी. इससे सरकार के लिए प्रशासनिक और वित्तीय संकट पैदा हो सकता है। एक विभाग में छूट देने से पूरे प्रदेश में उपनल कर्मियों के नियमितीकरण की बाढ़ आ जाएगी, जिसे राज्य का खजाना वहन नहीं कर पाएगा। ऐसे में राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट की शरण में जाना चाहती है ताकि इस पेंच का कोई समाधान मिल सके।

इन्हीं तर्कों के आधार पर तय किया गया कि राज्य कर के इन कर्मचारियों पर आए हाईकोर्ट के आदेशों पर सरकार सुप्रीम कोर्ट में एसएलपी दायर करेगी। ऐसे में राज्य कर विभाग से तत्काल प्रस्ताव मांगा गया है ताकि विधिक प्रक्रिया शुरू की जा सके। वहीं न्याय विभाग को एसएलपी का ड्राफ्ट तैयार करने को कहा गया है।

उधर सरकार के सुप्रीम कोर्ट जाने के फैसले से उपनल कर्मियों में निराशा है। उपनल कर्मचारी संगठन का कहना है कि वे 10-15 साल से विभाग में सेवा दे रहे हैं। कृत्रिम व्यवधान विभाग की गलती से हुआ, कर्मियों की नहीं। समान काम के बदले समान वेतन उनका संवैधानिक, हक है। बहरहाल माना जा रहा है कि इस पेंच को लेकर सुप्रीम कोर्ट जाने से सरकार को काफी वक्त के लिए बड़ी राहत मिल सकती है।

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तय है कि जब तक सुप्रीम कोर्ट से फैसला नहीं आता उपनल कर्मी समान वेतन के अरमान में समान काम करते रहेंगे। लेकिन बड़ा सवाल ये है कि इस सेवा के दौरान उपनल कर्मियों की घर गृहस्थी का क्या होगा क्योंकि सरकार तकनीकी पेंचों के चलते फिलहाल समान वेतन देने के मूड में नहीं दिखती जबकि उपनल से मानदेय भी लटका हुआ है। दोनो के सामने आगे कुंआ पीछे खाई वाले हालात उभर गए हैं चाहे उपनल कर्मी हों या सरकार।