उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों से लगातार हो रहे पलायन का एक बेहद डरावना और दर्दनाक पहलू सामने आया है, जहां सैकड़ों घोस्ट विलेज अब गुलदारों के सुरक्षित ठिकाने बन चुके हैं। खाली पड़े मकान, घनी झाड़ियां और सुनसान रास्ते गुलदारों को छिपने के लिए अनुकूल माहौल दे रहे हैं, जहां से घात लगाकर वे आसपास के आबाद गांवों के मासूम लोगों को अपना शिकार बना रहे हैं।
वन विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, राज्य में पिछले 25 वर्षों के भीतर वन्यजीवों के हमलों में करीब दस गुना की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है; साल 2000 में वन्यजीवों के हमलों में घायल होने वालों की संख्या महज 56 थी, जो वर्ष 2025 में बढ़कर 557 तक पहुंच गई है। पहाड़ों में मैदानों की तुलना में मानव-वन्यजीव संघर्ष दोगुना रफ्तार से बढ़ा है, जिसमें पौड़ी और अल्मोड़ा जिले गुलदार के आतंक की सबसे बड़ी मार झेल रहे हैं।
आंकड़ों के अनुसार, अकेले पौड़ी जिले में सबसे अधिक 189 घोस्ट विलेज हैं, और पिछले 5 सालों में यहां गुलदार के हमलों में 32 लोगों की मौत व 140 लोग घायल हुए हैं। वन संरक्षकों और विशेषज्ञों का मानना है कि गुलदार हमेशा इंसानी आबादी के आसपास रहना पसंद करता है, इसलिए खाली गांवों के खंडहर और झाड़ियां उनके लिए बेहतरीन आवास बन गए हैं। इस गंभीर संकट से निपटने के लिए वरिष्ठ वैज्ञानिकों ने इन निर्जन क्षेत्रों में मानवीय गतिविधियां बढ़ाने और सरकार द्वारा निगरानी तंत्र को और अधिक मजबूत करने की सख्त आवश्यकता जताई है।

