कुल्हान गांव से डांडा लाखौंड तक ‘मनमानी का नशा’, शराब दुकानों पर ओवर रेटिंग से उपभोक्ता परेशान…

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देहरादून। राजधानी देहरादून में शराब की सरकारी दुकानों पर ओवर रेटिंग का खेल थमने का नाम नहीं ले रहा है। हालात ऐसे हैं कि शहर के अलग-अलग इलाकों से लगातार शिकायतें सामने आ रही हैं, लेकिन कार्रवाई के नाम पर तस्वीर जस की तस बनी हुई है। नतीजा यह है कि शराब कारोबारी नियम-कायदों की परवाह किए बिना मनमाने तरीके से उपभोक्ताओं से अधिक कीमत वसूलने में जुटे हैं।
ताजा चर्चाएं कुल्हान गांव स्थित अंग्रेजी शराब की दुकान और डांडा लाखौंड स्थित अंग्रेजी शराब की दुकान को लेकर हैं। स्थानीय लोगों और उपभोक्ताओं का आरोप है कि इन दुकानों पर निर्धारित मूल्य से अधिक रकम वसूले जाने की शिकायतें लंबे समय से सामने आ रही हैं। कई बार ग्राहकों ने विरोध भी जताया, लेकिन हालात में कोई खास सुधार नहीं दिखा। सबसे गंभीर बात यह है कि ओवररेटिंग का विरोध करने वाले ग्राहकों को कई बार अभद्र व्यवहार का सामना करना पड़ता है। आरोप है कि बहस की शुरुआत गाली-गलौज से होती है और कई मामलों में स्थिति हाथापाई तक पहुंच जाती है। ऐसे माहौल में आम उपभोक्ता शिकायत करने से भी कतराने लगे हैं। कुल्हान गांव क्षेत्र तेजी से आबादी वाला इलाका बन चुका है। यहां बड़ी संख्या में स्थानीय निवासी और आसपास के क्षेत्रों से आने वाले लोग शराब खरीदने पहुंचते हैं। वहीं डांडा लाखौंड, जो राजधानी के विकसित होते पॉश इलाकों में गिना जाता है, वहां भी उपभोक्ताओं की अच्छी-खासी आवाजाही रहती है। ऐसे महत्वपूर्ण इलाकों में यदि सरकारी दुकानों पर ही मूल्य सूची और नियमों की खुलेआम अनदेखी हो रही हो तो यह आबकारी विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करता है।

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सरकार ने शराब की दुकानों पर होने वाली अनियमितताओं को रोकने के लिए टोल-फ्री नंबर, शिकायत पोर्टल और अन्य शिकायत तंत्र उपलब्ध कराए हैं। उद्देश्य यह था कि उपभोक्ताओं को तत्काल राहत मिल सके और दोषियों पर कार्रवाई हो। लेकिन जमीनी हकीकत कुछ और ही कहानी बयां कर रही है। शिकायतों के बावजूद कार्रवाई का असर दिखाई नहीं देता, जिससे शराब कारोबारियों के हौसले और बुलंद होते नजर आ रहे हैं।

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स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि समय रहते सख्ती नहीं की गई तो यह समस्या और गंभीर रूप ले सकती है। उनका सवाल है कि जब शराब की बिक्री पूरी तरह सरकारी नियमों के तहत होनी है, तो फिर उपभोक्ताओं से अतिरिक्त वसूली आखिर किसके संरक्षण में हो रही है? और यदि शिकायतों के बाद भी कार्रवाई नहीं हो रही, तो फिर शिकायत तंत्र का औचित्य क्या रह जाता है?

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राजधानी के कुल्हान गांव और डांडा लाखौंड जैसे इलाकों से उठ रही ये आवाजें अब आबकारी विभाग के लिए चुनौती बनती जा रही हैं। देखने वाली बात यह होगी कि विभाग इन शिकायतों को गंभीरता से लेकर कार्रवाई करता है या फिर ओवररेटिंग का यह खेल आगे भी उसी तरह चलता रहेगा, जैसे अब तक चलता आया है।

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