आप उत्तराखंडी हो और दुनिया के किसी भी कोने में रहते हो तो आपने “बेड़ो पाको बारहमासा ओ नारेण कपलो पाको चैत मेरी छैला” जरूर सुना होगा। आपके पांव भी थिरके होंगे, आपके होंठों ने बजते हुए गीत के साथ जुगलबंदी की कोशिश भी की होगी। जिसने इस अमर गीत को सुर-संगीत ताल और लय दी उसे देश के पहले प्रधानमंत्री ने बेडो पाक्को ब्बॉय का टाइटल दिया था। उस मशहूर रंगकर्मी का नाम था मोहन उप्रेती। उनके गीत है उनका संगीत है उनकी रचनाएं हैं लेकिन उनकी जीवित देह हमारे बीच नहीं हैं। 6 जून 1997 को बेडू पाको ब्वाय का निधन हो गया था। उनके परलोक सिधारने की तारीख 6 जून को उत्तराखंड के रंगकर्मी और उनको करीब से जानने समझने वाले कभी नहीं भूलते।

मोहन उप्रेती जी का जन्म 17 फरवरी, 1928 में रानीधारा, अल्मोड़ा में हुआ था। उप्रेती जी सुप्रसिद्ध रंगकर्मी और लोक संगीत के मर्मज्ञ थे। कुमांउनी संस्कृति, लोकगाथों को राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय पहचान दिलाने में इनकी अहम भूमिका रही। बर्ष 1949 में एमए करने के बाद 1952 तक अल्मोड़ा इण्टर कालेज में इतिहास के प्रवक्ता पद पर कार्य किया। 1951 में ‘लोक कलाकार संघ’ की स्थापना की। 1950 से 1962 तक कम्युनिस्ट पार्टी के लिये भी कार्य किया। इस बीच पर्वतीय संस्कृति का अध्ययन और सर्वेक्षण का कार्य किया।
सुप्रसिद्ध लोक कलाकार मोहन सिंह बोरा ‘रीठागाड़ी’ के सम्पर्क में आने के बाद मोहन उप्रेती लगातार सांस्कृतिक गतिविधियों में शामिल होने लगे। कुमाऊं और गढ़वाल में अनेक सांस्कृतिक कार्यक्रम किये। वामपंथी की ओर रुझान के चलते जब सन 62 में भारत चीन का युद्ध हुआ तो उप्रेती जी को गिरफ्तार कर लिया गया और नौ महीने के लिए जेल भेज दिया गया।
जेल से छूटने के बाद उप्रेती जी दिल्ली चले गए। जहां दिल्ली के ‘भारतीय कला केन्द्र’ में कार्यक्रम अधिकारी के पद पर इनकी तैनाती हुई और 1971 तक इस पद पर रहे। इस बीच उन्होने दिल्ली में पर्वतीय क्षेत्र के लोक कलाकारों के सहयोग से 1968 में ‘पर्वतीय कला केन्द्र’ की स्थापना की।
वहीं राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली में 1992 तक प्रवक्ता और एसोसियेट प्रोफेसर भी रहे। बेडू पाको ब्वाय गढ़्वाल और कुमाऊं की लोक कला के ऐसे सशक्त हस्ताक्षर थे जिनको आज भी याद किया जाता है। उप्रेती जी ने उत्तराखंड की लोककला को दुनिया के मंच पर जगह दिलवाई। अपने रंगमंचीय जीवन में इन्होंने दुनिया भर के बाइस देशों की यात्रा की और वहां सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये।
अल्जीरिया, सीरिया, जार्डन, रोम आदि देशों की यात्राएं की और वहां पर सांस्कृतिक कलाकारों के साथ पर्वतीय लोक संस्कृति को प्रचारित किया। पर्वतीय लोक कलाकारों के साथ 1988 में चीन, थाईलैण्ड और उत्तरी कोरिया का भ्रमण किया। ‘श्रीराम कला केन्द्र’ के कलाकारों के साथ लगभग बीस देशों का भ्रमण किया। सिक्किम के राजा नाम्ग्याल ने इन्हें राज्य में सांस्कृतिक कार्यक्रमों को प्रस्तुत करने के लिये विशेष रुप से आमंत्रित किया।
अल्मोड़ा में अपने अनन्य सहयोगियों ब्रजेन्द्र लाल शाह, बांके लाल शाह, सुरेन्द्र मेहता, तारा दत्त सती, लेनिन पन्त और गोवर्धन तिवाड़ी के साथ मिलकर ‘लोक कलाकार संघ’ की स्थापना की। अपने रंगमंचीय जीवन में उप्रेती जी ने पर्वतीय क्षेत्रों के लगभग डेढ़ हजार कलाकारों को प्रशिक्षित किया और 1200 के करीब सांस्कृतिक कार्यक्रम प्रस्तुत किये।
राजुला-मालूशाही, रसिक-रमौल, जीतू-बगड़वाल, रामी-बौराणी, अजुवा-बफौल जैसी तेरह लोक कथाओं और विश्व की सबसे बड़ी गायी जाने वाली गाथा ‘रामलीला’ का पहाड़ी बोलियों (कुमाउनी और गढ़वाली) में अनुवाद कर मंच निर्देशन कर प्रस्तुत किया। इसके अतिरिक्त हिन्दी और संस्कृत में मेघदूत और इन्द्रसभा, गोरी-धन्ना का हिन्दी में मंचीय निर्देशन किया।
मोहन उप्रेती जी भारत सरकार के सांस्कृतिक विभाग की लोक नृत्य समिति के विशेषज्ञ सदस्य रहे, हिमालय की सांस्कृतिक धरोहर के एक्सपर्ट सदस्य और भारतीय सांस्कृतिक परिषद के भी विशिष्ट सदस्य रहे। लोक संस्कृति को मंचीय माध्यम से अभिनव रूप में प्रस्तुत करने, संगीत निर्देशन और रंगमंच के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिये इन्हें साहित्य कला परिषद, दिल्ली द्वारा 1962 में पुरस्कृत किया गया।
संगीत निर्देशन पर उन्हें 1981 में भारतीय नाट्य संघ ने पुरस्कृत किया। लोक नृत्यों के लिये संगीत नाटक अकादमी द्वारा 1985 में पुरस्कृत हुये। हिन्दी संस्थान उप्र सरकार नें उन्हें सुमित्रानन्दन पन्त पुरस्कार देकर सम्मानित किया। जोर्डन में आयोजित समारोह में प्रसिद्ध गोल्डन बियर पुरस्कार से भी पुरस्कृत हुये।
इण्डियन पीपुल्स थियेटर एसोसियेशन (इप्टा) के भी सदय रहे। सलिल चौधरी, उमर शेख और बलराज साहनी जैसे कलाकारों के साथ मिलकर कई कार्यक्रम भी प्रस्तुत किये। उत्तराखण्डी लोक संस्कृति के चितेरे का 6 जून, 1997 को निधन हो गया। उनका गाया और संगीतबद्ध किया गया लोकगीत ‘बेडू पाको बारा मासा’ हमेशा उनकी याद दिलाता रहेगा।

