राज्य में एक वायरल वीडियो ने प्रशासनिक व्यवस्था और तथाकथित VIP कल्चर पर बहस छेड़ दी है। वीडियो में एक व्यक्ति, जो खुद को आईएएस अधिकारी का पिता बता रहा है, खुलेआम लोगों को यह कहते सुनाई देता है—“वीडियो बना लो, पीएमओ भेज दो या देहरादून भेज दो, इससे क्या हो जाएगा।” मामला घर में पानी की किल्लत और बोरिंग (समर सिविल) खुदवाने को लेकर हुए विवाद से जुड़ा बताया जा रहा है, लेकिन जिस अंदाज में आईएएस पद का हवाला देकर धौंस दिखाई गई, उसने पूरे घटनाक्रम को गंभीर बना दिया है। अब यह सवाल उठ रहा है कि क्या वाकई सिस्टम में कुछ लोग खुद को कानून से ऊपर मानने लगे हैं, या फिर यह सिर्फ एक व्यक्तिगत आवेश था जो कैमरे में कैद हो गया।जिला देहरादून से जुड़ा एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें एक आईएएस अधिकारी के पिता कथित तौर पर अपनी बेटी के पद का हवाला देते हुए लोगों को चेतावनी देते नजर आ रहे हैं। वीडियो में साफ तौर पर देखा और सुना जा सकता है कि वह व्यक्ति कह रहा है—“वीडियो बना लो, इसे पीएमओ तक भेज दो या देहरादून भेज दो, इससे क्या हो जाएगा।” इस बयान के बाद पूरे मामले ने तूल पकड़ लिया है और लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया है।
बताया जा रहा है कि मामला पानी की समस्या से जुड़ा हुआ है। घर पर पानी की किल्लत के चलते समर सिविल (बोरिंग) खुदवाने की बात सामने आई है। हालांकि, इसके लिए प्रशासनिक अनुमति ली गई थी या नहीं, यह अभी जांच का विषय है। लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में जो बात सबसे ज्यादा लोगों को खटक रही है, वह है आईएएस अधिकारी के नाम पर कथित रूप से धौंस दिखाना और सार्वजनिक रूप से इस तरह की भाषा का इस्तेमाल करना।
एक तरफ जहां किसी परिवार के लिए बेटी का आईएएस अधिकारी बनना गर्व की बात होती है, वहीं दूसरी ओर उसी पद का इस्तेमाल कर दूसरों पर दबाव बनाने की कोशिश करना कई सवाल खड़े करता है। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के बाद लोग इस व्यवहार की आलोचना कर रहे हैं और इसे गलत ठहरा रहे हैं। आम लोगों का कहना है कि अगर कोई विवाद या कहासुनी होती है, तो उसे सामान्य तरीके से सुलझाया जाना चाहिए, न कि पद और प्रतिष्ठा का हवाला देकर।
राज्य के मुख्यमंत्री पहले ही कई बार यह स्पष्ट कर चुके हैं कि उत्तराखंड में कानून सबके लिए समान है और कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितना ही प्रभावशाली क्यों न हो, नियमों से ऊपर नहीं है। ऐसे में इस तरह के मामलों का सामने आना सरकार की उस नीति पर भी सवाल खड़े करता है, जिसमें सभी को बराबरी का अधिकार और जिम्मेदारी दी गई है।
फिलहाल यह मामला सोशल मीडिया से निकलकर जनचर्चा का हिस्सा बन चुका है। अब देखना होगा कि प्रशासन इस पर क्या रुख अपनाता है और क्या इस पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सामने लाई जाती है या नहीं।

