हाथ में फर्जी आयुर्वेदिक डिप्लोमा होने के बावजूद बेहिचक भारतीय चिकित्सा परिषद उत्तराखंड मे पंजीकरण करवाने वाले गली मुहल्ले के फर्जी आयुर्वेदाचार्यों पर फिर से गाज गिरने वाली है। हालांकि पहले भी इन पर कार्रवाई की गई लेकिन दिल है कि मानता नहीं की तर्ज पर उन्होने फिर से गांव देहात के गली कूचों में अपनी क्लीनिक वाली दुकान सजा ली और जनता की जान से खेलने लगे।
सिर्फ दवा का नाम सुना और बीमार को पुडिया थमाने वाले फर्जी डॉक्टरों के इस कुनबे ने न जाने कितने लोगों को कभी न भूलने वाले जख्म दिए होंगे लेकिन ये अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहे हैं। पिछले साल भी उत्तराखंड में चिकित्सा परिषद ने जांच के बाद 400 फर्जी चिकित्सकों के पंजीकरण निरस्त किए गए थे।
बताया जा रहा है कि उन्होने यूपी के कॉलेजों से आयुर्वेद का डिप्लोमा बताया था लेकिन जांच में पता चला कि सब कुछ फर्जी था। न कालेज असली निकले न डिप्लोमा का कागज। इस जमात में कई ऐसे झोलाछाप भी शामिल हैं जिन्होंने आयुर्वेद का आ भी नहीं पढ़ा लेकिन फर्जी दस्तावेज जमा करवा कर आयुर्वेदिक चिकित्सक बन गए और गली मुहल्लों में चांदी काटने लगे।
उनकी दवा से कोई ठीक हो गया तो उसका नसीब और हालात बिगड़ गए तो बड़े अस्पताल ले जाने की सलाह देकर वो अपनी दुकान चला ही रहे हैं। मुहल्ले के ऐसे डॉक्टर साहबों की अब खैर नहीं है क्योकि शिकायत मिलने के बाद भारतीय चिकित्सा परिषद ने फिर से शासन को कार्रवाई के लिए कहा है।
जिस पर अमल करते हुए शासन जल्द ही अभियान चलाने वाला है ताकि झोलाछाप फर्जी डॉक्टरों की क्लीनिक का शटर बंद करवाया जा सके और मुहल्ले वालों की जान सलामत रहे। बहरहाल सवाल ये है कि अगर राज्य के गली कूचों में झोलाछाप इलाज कर रहे हैं तो मे सूबे में लागू क्लीनिकल एस्टेबिलशमेंट एक्ट क्या कर रहा है ? आखिर इस कानून की फाइल की समय-समय पर धूल साफ क्यों नहीं की जाती ताकि गली मुहल्लों की जाने, फर्जी डॉक्टरों की डॉक्टरी प्रेक्टिस से महफूज रह सकें।

