10 लाख तक के विकास कार्यों को सीधे ग्राम पंचायतों को सौंपने की उठी मांग, पलायन रोकने की बड़ी पहल

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उत्तराखंड प्रदेश ग्राम प्रधान संगठन ने ग्रामीण क्षेत्रों के चहुंमुखी विकास और जमीनी स्तर पर प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने के लिए राज्य सरकार के सामने एक बड़ा प्रस्ताव रखा है। संगठन के पदाधिकारियों ने मांग उठाई है कि गांवों में होने वाले 10 लाख रुपये तक की लागत के छोटे विकास कार्यों की कार्यदायी संस्था सीधे ग्राम पंचायतों को ही बनाया जाए।

उनका मानना है कि यदि छोटे निर्माण और विकास कार्य सीधे गांव के स्तर पर होंगे, तो इससे न केवल स्थानीय लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर पैदा होंगे, बल्कि पहाड़ों से होने वाले निरंतर पलायन पर भी काफी हद तक प्रभावी रोक लग सकेगी। इस महत्वपूर्ण व्यवस्था को लागू कराने के लिए संगठन ने एक 10 सूत्रीय मांग पत्र तैयार किया है, जिस पर वे जल्द ही सरकार के उच्च अधिकारियों और मंत्रियों से मिलकर बातचीत की शुरुआत करेंगे।

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ग्राम प्रधान निधि का बजट तय करने की वकालत

इस बड़े अभियान के अंतर्गत कुमाऊं अध्यक्ष हेमराज बिष्ट और गढ़वाल अध्यक्ष भूपेंद्र रावत सहित अन्य प्रतिनिधियों ने सरकार से मांग की है कि विधायकों और सांसदों को मिलने वाली विकास निधि की तर्ज पर ही ‘ग्राम प्रधान निधि’ का एक अलग बजट निर्धारित किया जाए। इसके साथ ही, पंचायतीराज एक्ट के तहत पारित सभी 29 विभागों को पूरी तरह से ग्राम पंचायतों को हस्तांतरित करने की जोरदार वकालत की गई है, ताकि गांव की सरकार को असली प्रशासनिक शक्तियां मिल सकें।

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संगठन ने राज्य और केंद्र वित्त आयोग से मिलने वाली धनराशि का आवंटन भी गांवों की जनसंख्या और भौगोलिक क्षेत्रफल के आधार पर बढ़ाने का सुझाव दिया है। इसके अलावा, जनप्रतिनिधियों की गरिमा और आजीविका को ध्यान में रखते हुए ग्राम पंचायत प्रतिनिधियों को न्यूनतम 20 हजार रुपये प्रति माह मानदेय देने की मांग की गई है, और साथ ही उत्तराखंड में मनरेगा सहित तमाम अन्य सरकारी योजनाओं में आ रही तकनीकी दिक्कतों को देखते हुए ऑनलाइन हाजिरी की व्यवस्था को पूरी तरह बंद कर दोबारा ऑफलाइन किए जाने का अनुरोध किया गया है।

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