उत्तराखंड के पहाड़ी और मैदानी क्षेत्रों के 21 मुख्य शहरों में कचरा निस्तारण की स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है। इन क्षेत्रों में वैज्ञानिक तरीके से कचरा प्रबंधन के लिए प्रस्तावित ‘ठोस अपशिष्ट प्रबंधन’ योजनाएं समय पर आगे नहीं बढ़ पाई हैं और केवल फाइलों तक ही सीमित रह गई हैं।
शहरी विकास विभाग के मुताबिक, इस महात्वाकांक्षी प्रोजेक्ट के शुरुआती स्तर पर ही अटक जाने के कारण कचरे का सही तरीके से निपटारा नहीं हो पा रहा है। गजा, रुद्रप्रयाग, अगस्त्यमुनि, लोहाघाट, पौड़ी, अल्मोड़ा और चमोली जैसी महत्वपूर्ण जगहों पर योजना की रफ्तार पूरी तरह से थम गई है।
कानूनी अड़चनें बनीं सबसे बड़ा रोड़ा
इस परियोजना के धरातल पर न उतर पाने के पीछे कई प्रशासनिक और सामाजिक कारण जिम्मेदार हैं। शहरी विकास विभाग का कहना है कि कचरा निस्तारण प्लांट लगाने के लिए सबसे बड़ी समस्या उपयुक्त भूमि की अनुपलब्धता है। इसके अलावा, कई जगहों पर वन और राजस्व भूमि के उपयोग तथा उसके हस्तांतरण को लेकर पेचीदा कानूनी अड़चनें सामने आई हैं। इस समस्या को और अधिक जटिल स्थानीय स्तर पर जनता द्वारा किया जा रहा विरोध बना रहा है, जहाँ लोगों ने अपने रिहायशी इलाकों या पर्यावरण के लिहाज से संवेदनशील जमीनों पर प्लांट लगाए जाने को लेकर तीखी आपत्तियां दर्ज कराई हैं।
विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में वैज्ञानिक कचरा निस्तारण व्यवस्था का न होना पर्यावरण के लिए एक बहुत बड़ा खतरा बनता जा रहा है। कूड़े के समुचित प्रबंधन के अभाव में पहाड़ों की प्राकृतिक सुंदरता और पारिस्थितिकी तंत्र प्रभावित हो रहे हैं। कोई ठोस और स्थाई व्यवस्था न होने के कारण स्थानीय निकायों के पास सीमित विकल्प बचे हैं, जिसके चलते उन्हें मजबूरी में कचरा फेंकने के लिए अस्थाई और पारंपरिक उपायों पर ही निर्भर रहना पड़ रहा है, जो कि भविष्य के लिए एक गंभीर चिंता का विषय है।
अब क्लस्टर आधारित योजना से निकलेगा नया समाधान
इन तमाम अड़चनों और चुनौतियों के बावजूद विभाग ने इस जरूरी प्रोजेक्ट को बंद नहीं करने का फैसला लिया है। निदेशक विनोद गिरि गोस्वामी के अनुसार, भूमि और पर्यावरणीय स्वीकृति से जुड़ी देरी को दूर करने के लिए अब एक नई रणनीति अपनाई जा रही है। इसके तहत छोटे-छोटे स्थानीय निकायों को एक साथ मिलाकर एक ‘क्लस्टर आधारित योजना’ तैयार की जा रही है। इस नई व्यवस्था के लिए एक नई और विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (DPR) बनाई जा रही है, ताकि कानूनी और स्थानीय विवादों को सुलझाते हुए राज्य में कचरा निस्तारण व्यवस्था को एक बेहतर और दीर्घकालिक रूप दिया जा सके।

