देहरादून। राजधानी देहरादून के प्रमुख सरकारी अस्पतालों में सस्ती जेनेरिक दवाओं की जनऔषधि योजना प्रशासनिक दावों तक ही सीमित रह गई है। दून अस्पताल, कोरोनेशन, प्रेमनगर और रायपुर अस्पतालों में जनऔषधि केंद्र उपलब्ध होने के बाद भी डॉक्टर मरीजों को बाहर के प्राइवेट मेडिकल स्टोरों से महंगी ब्रांडेड दवाएं खरीदने के लिए मजबूर कर रहे हैं।
अस्पताल परिसर में जनऔषधि केंद्र खुले होने के बावजूद ओपीडी और इमरजेंसी वार्डों से मरीजों को बिना मुहर वाली पर्चियां दी जा रही हैं। ऑर्थो, पीडिया और सर्जरी विभागों की पड़ताल में सामने आया कि केंद्रों पर उपलब्ध सस्ती दवाओं को डॉक्टर पर्चों पर लिख ही नहीं रहे हैं। वहीं, आयुष्मान योजना के पात्र मरीजों को भी आयुष्मान काउंटर तक भेजने के बजाय बाहर का रास्ता दिखाया जा रहा है।
अस्पतालों में चल रहे इस खेल की 3 प्रमुख केस स्टडीज
अस्पतालों में चल रहे इस खेल का अंदाजा 3 प्रमुख केस स्टडीज से लगाया जा सकता है। सुबह 10:30 बजे पीडिया विभाग में 11 साल की बच्ची रूही के लिए 80 रुपये का जेनेरिक लिवर सिरप छोड़कर 150 रुपये की ब्रांडेड दवा बाहर से लाने की पर्ची थमाई गई।
इसके बाद सुबह 11:30 बजे दून अस्पताल की ओपीडी में आंखों की मरीज ललिता नौटियाल को 60 और 47 रुपये की दर्द व ग्रीस की दवाएं जनऔषधि केंद्र से न मिलने पर बाहर से 150 और 250 रुपये में खरीदनी पड़ीं, जबकि दोपहर 02:30 बजे सर्जरी विभाग में कमलेश्वरी देवी को 52 रुपये की प्रीबायोटिक दवा के बजाय 250 रुपये की ब्रांडेड दवा अस्पष्ट लिखावट वाले पर्चे पर लिखकर दी गई।
इस प्रशासनिक लापरवाही के बीच मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. मनोज शर्मा के साफ पर्ची व सॉल्ट नेम लिखने के निर्देशों और दून अस्पताल की प्राचार्य डॉ. गीता जैन व एमएस डॉ. आरएस बिष्ट के सख्त आदेशों का धरातल पर कोई असर नजर नहीं आ रहा है।
डॉक्टरों की इसी मनमानी के चलते प्रेमनगर, रायपुर और कोरोनेशन के जनऔषधि केंद्रों पर बिक्री गिर रही है और प्राइवेट दुकानों पर भीड़ बढ़ रही है, जिस पर रेडक्रॉस के चेयरमैन डॉ. एमएस अंसारी ने चिंता जताते हुए कहा है कि डॉक्टरों के सहयोग के बिना इन केंद्रों को चलाना और कर्मचारियों का वेतन निकालना भी कठिन हो गया है, जिसके लिए अधिकारियों से जल्द दोबारा वार्ता की जाएगी।

