देहरादून। उत्तराखंड की राजनीति में विरोध भी गजब है और नेताओं की दोस्ती भी कमाल की! दिन के उजाले में भाजपा नेताओं को पानी पी-पीकर कोसने वाले कांग्रेस के नेता जब भाजपा नेता के पुत्र की शादी में हंसते-मुस्कुराते और ठिठोली करते नजर आए, तो सियासत के इस रंग ने कई सवाल खड़े कर दिए। सवाल सिर्फ शादी में शामिल होने का नहीं, बल्कि उस राजनीतिक विरोधाभास का भी है, जिसमें सार्वजनिक मंचों पर तलवारें खिंची दिखाई देती हैं और निजी समारोहों में रिश्तों की गर्मजोशी बरकरार नजर आती है। दरअसल, उत्तराखंड की राजनीति में इन दिनों आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। अंकित प्रकरण को लेकर भी राजनीतिक बयानबाजी और सवालों का सिलसिला थमा नहीं है। ऐसे माहौल में भाजपा नेता के पुत्र के विवाह समारोह में कांग्रेस नेताओं की मौजूदगी ने सियासी गलियारों में चर्चा को हवा दे दी। जिन नेताओं की जुबान पर दिन में भाजपा के खिलाफ हमले होते हैं, उन्हीं के चेहरे शादी समारोह में मुस्कान बिखेरते दिखाई दिए। अब इसे सियासी शिष्टाचार कहें, निजी संबंधों की मजबूरी या फिर राजनीति का दोहरा चरित्र, यह बहस का विषय जरूर बन गया है।
दिन में विरोध, शाम को मुस्कान… आखिर यह कैसा सियासी रिश्ता?
नेताओं की ओर से अक्सर दलील दी जाती है कि शादी-ब्याह और पारिवारिक समारोह निजी मामले होते हैं। कौन किसकी शादी में जाएगा और किसकी में नहीं, यह उसका व्यक्तिगत फैसला है। इस तर्क से इनकार भी नहीं किया जा सकता। लोकतंत्र में राजनीतिक विरोध का मतलब व्यक्तिगत दुश्मनी होना जरूरी नहीं है। अलग-अलग विचारधाराओं के नेता सामाजिक समारोहों में मिलें, बातचीत करें और संबंध निभाएं, इसमें अपने आप में कुछ गलत नहीं है। लेकिन सवाल तब उठता है, जब राजनीतिक मंचों पर किसी मामले को लेकर बेहद गंभीर आरोप लगाए जा रहे हों और उसी प्रकरण से जुड़े राजनीतिक विरोधियों के बीच निजी समारोहों में सहजता दिखाई दे। जनता के मन में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर विरोध कितना गंभीर है और राजनीतिक बयानबाजी की सीमाएं कहां तक हैं? इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक सवाल और भी चर्चा में है। यदि अंकिता के माता-पिता, जो संबंधित मामले में नेताओं पर गंभीर आरोप लगा रहे हैं, यदि उन नेताओं के परिवार में कोई आयोजन हो क्या अंकिता का परिवार वहां जाएगा इसका जवाब शायद ना हो सकता है।। वो नहीं जाएंगे तो फिर जो नेता अंकिता का नाम लेकर सड़को पर विलाप कर रहे है वो कैसे इन आयोजनों में पहुंच जाते है।
जनता के लिए राजनीति, नेताओं के लिए रिश्ते?
उत्तराखंड की सियासत में यह तस्वीर एक बड़ा सवाल छोड़ती है। क्या राजनीतिक विरोध सिर्फ जनता के सामने अपनी-अपनी भूमिका निभाने तक सीमित है? क्या कैमरों के सामने तीखे तेवर दिखाने वाले नेता निजी जीवन में एक-दूसरे के साथ सहज संबंध बनाए रखते हैं? यदि ऐसा है, तो यह लोकतांत्रिक शिष्टाचार भी हो सकता है, लेकिन जनता को यह समझना होगा कि राजनीतिक मंच पर होने वाला विरोध और निजी जीवन के रिश्ते हमेशा एक जैसे नहीं होते।
हालांकि, किसी शादी में शामिल होना अपने आप में किसी राजनीतिक आरोप का समर्थन या विरोध छोड़ने का प्रमाण नहीं है। फिर भी, जब प्रदेश की राजनीति में कोई मुद्दा संवेदनशील हो और उस पर जनता जवाब मांग रही हो, तब नेताओं की सार्वजनिक गतिविधियां चर्चा का विषय बनना स्वाभाविक है।
फिलहाल नेता पुत्र की शादी ने उत्तराखंड की राजनीति में एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि नेताओं की दुश्मनी असली है या सिर्फ सियासी मंच की पटकथा? चेहरे पर विरोध और समारोह में मुस्कान के इस मेल को देखकर इतना तो कहा ही जा सकता है कि राजनीति की अपनी मजबूरियां हैं, रिश्तों की अपनी कहानी है और जनता इन दोनों के बीच का फर्क समझने की कोशिश कर रही है।क्योंकि सियासत में बयान भले ही तल्ख हों, लेकिन शादी के मंडप में मुस्कान का हिसाब कौन रखेगा?

