मैदाने जंग में गिरते है शहसवार, धामी के फिसलने पर क्यो मचा हाहाकार ?

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देहरादून। सियासत में विचारधारा की जगह विरोध ने ले ली है और सिद्धांतों की जगह सियासी स्वार्थ ने। आलम यह है कि विरोधी दलों के नेता एक-दूसरे को घेरने के लिए न पद की गरिमा का लिहाज कर रहे हैं और न ही उम्र के तकाजे का। राजनीतिक बयानबाजी में शब्दों की मर्यादा लगातार कमजोर पड़ती जा रही है। कभी निजी टिप्पणियां, कभी परिवार को निशाना बनाने की कोशिश और कभी सोशल मीडिया पर हल्की-फुल्की घटनाओं को राजनीतिक हथियार बनाने की कवायद। सवाल यह है कि क्या राजनीति में विरोध का मतलब अब हर हाल में किसी को नीचा दिखाना ही रह गया है?

राजनीति का यही बदलता मिजाज अब एक और बहस को जन्म दे रहा है। एक तरफ बड़े नेता अपने बयानों को लेकर चर्चा में रहते हैं, तो दूसरी तरफ सोशल मीडिया पर सक्रिय राजनीतिक समर्थक विरोधी दलों के शीर्ष नेताओं की छोटी-छोटी घटनाओं को भी बड़ा मुद्दा बनाने में जुट जाते हैं। ताजा मामला मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी से जुड़ा है, जिनके पहाड़ी रास्ते पर फिसलने की घटना को लेकर सोशल मीडिया पर टिप्पणियां की जा रही हैं। कुछ लोगों के लिए यह महज एक सामान्य घटना नहीं, बल्कि राजनीतिक तंज कसने का मौका बन गई।

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लेकिन सवाल यह है कि क्या पहाड़ के रास्ते पर फिसल जाना किसी की राजनीतिक क्षमता का पैमाना हो सकता है?

पहाड़ की पगडंडी पर चलना और सोशल मीडिया पर ज्ञान देना, दोनों में फर्क है!

मैदानों में बैठकर पहाड़ की राजनीति पर टिप्पणी करना आसान है, लेकिन पहाड़ की पगडंडियों पर कदम जमाकर चलना उतना आसान नहीं। यहां रास्तों का मिजाज पल-पल बदलता है। कहीं ढलान, कहीं पत्थर, कहीं मिट्टी और कहीं ऐसा फिसलन भरा मोड़, जहां अनुभवी व्यक्ति का संतुलन भी बिगड़ सकता है। ऐसे में किसी के फिसलने को लेकर उपहास उड़ाना उन लोगों की समझ पर भी सवाल खड़ा करता है, जिन्हें पहाड़ की भौगोलिक परिस्थितियों का शायद पर्याप्त अनुभव नहीं है।

मुख्यमंत्री धामी हों या कोई सामान्य व्यक्ति, पहाड़ी रास्ते पर फिसलना मानवीय घटना है। इसे सीधे राजनीतिक कमजोरी से जोड़ देना विरोध की उस मानसिकता को दिखाता है, जिसमें मुद्दे से ज्यादा व्यक्ति को निशाना बनाना अहम हो गया है। राजनीति में सवाल पूछिए, नीतियों की आलोचना कीजिए, फैसलों पर जवाब मांगिए, लेकिन किसी सामान्य घटना को व्यक्तिगत उपहास का विषय बनाना आखिर किस तरह की राजनीतिक समझदारी है?

एवरेस्ट फतह करने वाले भी जानते हैं फिसलन का मतलब!

जरा उन पर्वतारोहियों से पूछिए, जिन्होंने दुनिया की सबसे ऊंची चोटी माउंट एवरेस्ट पर तिरंगा फहराने का सपना देखा और उसे पूरा करने के लिए जोखिम भरे रास्तों पर कदम बढ़ाए। क्या उनका सफर बिना किसी चुनौती, लड़खड़ाहट या मुश्किल के पूरा हुआ होगा? पहाड़ पर चढ़ना सिर्फ हौसले का नहीं, बल्कि संतुलन, धैर्य, अनुभव और परिस्थितियों से जूझने का भी इम्तिहान है।

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मंजिल तक पहुंचने वाले हर शख्स की राह आसान नहीं होती। गिरने और संभलने का सिलसिला जीवन का हिस्सा है। फर्क इस बात से पड़ता है कि कोई गिरकर उठता है या दूसरों की ठोकरों पर तालियां बजाने में ही अपनी ऊर्जा खर्च कर देता है।

इसी संदर्भ में एक कहावत याद आती है—“मैदाने-जंग में गिरते हैं शहसवार, वो क्या गिरेंगे जो घुटनों के बल चलते हैं।” संदेश साफ है, संघर्ष के मैदान में उतरने वालों को मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। जो खुद जोखिम उठाते हैं, उनके सामने चुनौतियां भी आती हैं। दूर खड़े होकर तंज कसना आसान है, लेकिन मैदान में उतरकर मुकाम हासिल करना मुश्किल।

सियासत में विरोध हो, लेकिन स्तर भी तो हो!

लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका बेहद अहम है। सरकार की गलतियों पर सवाल उठाना, जनता के मुद्दे उठाना और सत्ता को जवाबदेह बनाना विपक्ष का दायित्व है। लेकिन जब राजनीतिक विरोध नीतियों और जनहित से हटकर व्यक्तिगत छींटाकशी तक सिमटने लगे, तो राजनीति की गंभीरता पर सवाल उठना स्वाभाविक है।

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मुख्यमंत्री धामी की किसी नीति से असहमति है तो उस पर सवाल उठाइए। सरकार के किसी फैसले में खामी है तो उसे तथ्यों के साथ सामने रखिए। लेकिन पहाड़ी रास्ते पर फिसलने की घटना को लेकर मजाक बनाना क्या वास्तव में जनता के मुद्दों को आगे बढ़ाता है?

राजनीतिक दलों और उनके समर्थकों को यह समझना होगा कि सोशल मीडिया पर कुछ पल की वाहवाही मिल जाना जनविश्वास जीतने के बराबर नहीं है। जनता सब देखती है—कौन मुद्दों पर बात कर रहा है और कौन सिर्फ छींटाकशी में अपनी सियासी ऊर्जा खपा रहा है।

आखिरकार, आसमान की तरफ थूकने का अंजाम क्या होता है, यह समझने के लिए बहुत बड़े राजनीतिक विश्लेषण की जरूरत नहीं है। राजनीति में आलोचना कीजिए, तीखे सवाल पूछिए और सत्ता को कठघरे में खड़ा कीजिए, लेकिन मर्यादा की सीमा मत लांघिए। क्योंकि किसी की फिसलन पर हंसने से पहले यह याद रखना जरूरी है कि जिंदगी और सियासत, दोनों के रास्ते हमेशा समतल नहीं होते।