वरिष्ठ निजी सचिव के ख़िलाफ़ शिकायती पत्र से कोहराम, शासन ने लिया संज्ञान — शिकायतकर्ता ने की ED जांच की मांग

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देहरादून, उत्तराखंड में भ्रष्टाचार को लेकर लगातार सामने आ रही शिकायतें अब सरकार के दावों की परीक्षा बनती जा रही हैं। “जीरो टॉलरेंस ऑन करप्शन” की नीति पर काम करने वाली धामी सरकार के लिए एक के बाद एक हो रही शिकायतें यह संकेत दे रही हैं कि जनता न केवल जागरूक हो रही है, बल्कि अब बेबाकी से अपनी बात शासन तक पहुंचा रही है। इसी क्रम में अब एक और बड़ा मामला सामने आया है — इस बार निशाने पर हैं एक वरिष्ठ निजी सचिव है जो लंबे समय तक मंत्रालय में ही अपनी सेवा देता रहा है, जिन पर अकूत संपत्ति अर्जित करने और भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। सूत्रों के अनुसार, इस मामले में शिकायतकर्ता बिशन सिंह सजवान नाम के एक व्यक्ति ने शासन को विस्तृत शिकायत भेजी है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि उक्त वरिष्ठ निजी सचिव के पास देश के विभिन्न हिस्सों में बेहिसाब संपत्ति है, जो उनकी सरकारी आय से मेल नहीं खाती। शिकायतकर्ता ने शासन से अनुरोध किया है कि इस मामले की जांच प्रवर्तन निदेशालय (ED) से कराई जाए ताकि सच्चाई सबके सामने आ सके। बताया जा रहा है कि शिकायत में कई ठोस बिंदु उठाए गए हैं। इनमें संपत्ति के स्थान, स्वामित्व से जुड़े दस्तावेज़, और वित्तीय लेन-देन की जानकारी शामिल है। शिकायत मिलने के बाद शासन स्तर पर भी हलचल मच गई है। सूत्रों के मुताबिक, शासन ने मामले को गंभीरता से लेते हुए शिकायतकर्ता से शपथ पत्र के साथ शिकायत मांगी है। गौरतलब है कि इससे पहले भी ऐसी शिकायतों पर कार्रवाई होती रही है। अब एक बार फिर किसी वरिष्ठ निजी सचिव पर भी गंभीर आरोप लगे हैं, तो यह मामला सरकार के लिए संवेदनशील माना जा रहा है। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा तेज है कि यदि आरोपों की जांच में सच्चाई पाई जाती है, तो मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी इस मामले में सख्त कदम उठा सकते हैं। मुख्यमंत्री पहले भी कई मौकों पर स्पष्ट कर चुके हैं कि “भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस” की नीति से कोई समझौता नहीं किया जाएगा। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी पहले ही इस बात के संकेत दे चुके है कि “किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। यदि किसी अधिकारी या कर्मचारी पर आरोप सिद्ध होते हैं, तो कार्रवाई तय है।”
विपक्ष ने मांग की है कि जांच किसी निष्पक्ष एजेंसी से कराई जाए ताकि मामले को दबाया न जा सके।शिकायत में यह भी दावा किया गया है कि उक्त वरिष्ठ निजी सचिव ने पिछले कुछ वर्षों में महंगी गाड़ियां, फ्लैट्स और प्लॉट खरीदे हैं, जबकि उनके आधिकारिक वेतन से इतनी संपत्ति अर्जित करना संभव नहीं है।अब देखने वाली बात यह होगी कि शासन इस शिकायत पर किस स्तर तक कार्रवाई करता है। क्या यह मामला केवल जांच तक सीमित रह जाएगा या फिर सरकार उदाहरण पेश करते हुए ठोस कदम उठाएगी? उत्तराखंड में लगातार हो रही भ्रष्टाचार की शिकायतें यह दर्शा रही हैं कि जनता अब अपनी आवाज़ बुलंद करने लगी है। वहीं “जीरो टॉलरेंस” वाले शासन मॉडल की अब असली परीक्षा भी इन्हीं मामलों से होगी। यदि सरकार ने पारदर्शी और कठोर कार्रवाई की, तो यह न केवल भ्रष्टाचार के खिलाफ सशक्त संदेश देगा, बल्कि प्रशासनिक तंत्र में भी विश्वास बहाल करेगा। लेकिन यदि मामला ठंडे बस्ते में गया, तो “एक विधान, एक संविधान, सबके लिए समान” का दावा सवालों के घेरे में आ सकता है।