देहरादून। राजनीति में दूसरों को आईना दिखाना जितना आसान है, अपने गिरेबान में झांकना उतना ही मुश्किल। उत्तराखंड में कांग्रेस की न्याय यात्रा और महिला सम्मान के दावों के बीच चकराता विधायक प्रीतम सिंह को लेकर उठ रहे सवाल कुछ ऐसी ही सियासी तस्वीर पेश कर रहे हैं। एक तरफ कांग्रेस महिलाओं के सम्मान और न्याय की लड़ाई लड़ने का दावा कर रही है, तो दूसरी तरफ चकराता में विधायक के भाइयों पर एक बेटी के पिता को धमकाने के आरोपों ने पार्टी के इन दावों पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मामले में पुलिस को तहरीर दिए जाने की बात सामने आई है।
सवाल यह है कि जब महिला सम्मान की लड़ाई का झंडा उठाने वाली पार्टी के अपने ही नेताओं के परिवार पर आरोप लगें, तो जवाबदेही से मुंह मोड़ना कहां तक उचित है? कांग्रेस इन दिनों न्याय यात्रा के जरिए महिला सम्मान और न्याय का संदेश देने में जुटी है। चुनावी साल की आहट के बीच पार्टी इस मुद्दे को राजनीतिक धार देने की कोशिश कर रही है। लेकिन चकराता से सामने आए इस विवाद ने कांग्रेस की रणनीति के सामने असहज सवाल खड़े कर दिए हैं। विधायक प्रीतम सिंह के भाइयों पर लगे आरोपों को लेकर अब निगाहें इस बात पर हैं कि मामले में निष्पक्ष जांच और जवाबदेही को लेकर उनका रुख क्या रहता है।
न्याय यात्रा का संदेश और चकराता के सवाल!
राजनीति में नैतिकता की कसौटी केवल भाषणों और नारों से तय नहीं होती, बल्कि मुश्किल वक्त में अपनाए गए रुख से भी होती है। यदि महिला सम्मान कांग्रेस के लिए इतना बड़ा मुद्दा है, तो फिर चकराता प्रकरण पर पार्टी और उसके वरिष्ठ नेता खुलकर अपनी बात क्यों नहीं रखते? आरोपों की निष्पक्ष जांच की मांग करना और पीड़ित पक्ष की बात सुनना किसी भी राजनीतिक दल की जिम्मेदारी होनी चाहिए।
इस पूरे प्रकरण में विधायक प्रीतम सिंह की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। आरोप उनके भाइयों पर हैं, इसलिए जांच से पहले किसी को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा। लेकिन एक वरिष्ठ जनप्रतिनिधि होने के नाते उनसे यह अपेक्षा जरूर की जा रही है कि वह मामले पर स्पष्ट रुख रखें और बेटी के सम्मान से जुड़े सवालों को महज राजनीतिक विवाद समझकर नजरअंदाज न करें।
दीक्षा के वीडियो ने बढ़ाई सियासी हलचल
मामले में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की पहल के बाद दीक्षा ने वीडियो जारी कर उनका आभार जताया और कांग्रेस की न्याय यात्रा पर भी सवाल उठाए। इस घटनाक्रम ने विवाद को राजनीतिक बहस के केंद्र में ला दिया है। अब यह मामला केवल आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित नहीं रह गया, बल्कि महिला सम्मान के दावों और राजनीतिक जवाबदेही की बहस से भी जुड़ गया है।
वहीं, भाजपा नेत्री मधु चौहान ने भी कांग्रेस पर निशाना साधते हुए चुनाव जीतने के तौर-तरीकों को लेकर आरोप लगाए हैं। उनके बयान ने सियासी टकराव को और तेज कर दिया है। हालांकि, इन राजनीतिक आरोपों से अलग मामले में पुलिस जांच और तथ्यों का सामने आना ही सबसे अहम होगा।
दूसरों को नसीहत देने से पहले अपने घर में झांकिए!
प्रीतम सिंह उत्तराखंड की राजनीति के वरिष्ठ चेहरों में शामिल हैं। ऐसे में उनसे अपेक्षा है कि वह इस विवाद पर स्थिति स्पष्ट करें। किसी भी नेता के परिवार के सदस्य पर लगे आरोप अपने आप में दोष साबित नहीं करते, लेकिन आरोपों के सामने आने पर पारदर्शिता और निष्पक्ष जांच की मांग से बचना भी सवालों को जन्म देता है। कांग्रेस की न्याय यात्रा का उद्देश्य यदि वास्तव में न्याय और महिला सम्मान को मजबूत करना है, तो चकराता के इस प्रकरण पर भी वही कसौटी लागू होनी चाहिए, जो पार्टी सत्ता पक्ष से अपेक्षा करती है।
आखिरकार, जिनके हाथ में न्याय का झंडा हो, उनसे सवाल भी ज्यादा पूछे जाते हैं। दूसरों के सम्मान और आचरण पर सवाल उठाने से पहले अपने आसपास उठ रहे सवालों का जवाब देना भी राजनीति की नैतिक जिम्मेदारी है। चकराता प्रकरण में अब सबसे जरूरी है निष्पक्ष जांच, आरोपों की सच्चाई सामने आना और संबंधित पक्षों का स्पष्ट जवाब। क्योंकि महिला सम्मान कोई चुनावी नारा नहीं, बल्कि हर परिस्थिति में निभाई जाने वाली जिम्मेदारी है।

