उत्तराखंड सरकार ने उपनल कर्मचारियों के हित में एक बड़ा फैसला लेते हुए स्पष्ट किया है कि जिन पदों पर वर्तमान में उपनल कर्मी तैनात हैं, उन पर कोई भी विभाग बिना अनुमति के सीधी भर्ती नहीं कर सकेगा। कार्मिक विभाग द्वारा जारी नए दिशा-निर्देशों के अनुसार, अब राज्य का कोई भी विभाग मनमाने तरीके से इन पदों को भरने के लिए अधियाचन (भर्ती प्रस्ताव) नहीं भेज पाएगा। अपर सचिव कार्मिक गिरधारी सिंह रावत ने साफ किया है कि इस प्रक्रिया के लिए अब न्याय, वित्त और कार्मिक विभाग की विधिवत अनुमति लेना अनिवार्य होगा। यह निर्णय नैनीताल हाईकोर्ट द्वारा ‘कुंदन सिंह बनाम उत्तराखंड राज्य’ मामले में दिए गए आदेश के अनुपालन में लिया गया है।
भर्ती प्रक्रिया पर कड़ा नियंत्रण
कार्मिक विभाग के इस आदेश से अब विभागों की मनमानी पर रोक लगेगी। पहले कई विभागों में सीधी भर्ती शुरू होने की वजह से उपनल कर्मचारियों को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ता था। अब नए नियमों के तहत, किसी भी भर्ती प्रक्रिया को शुरू करने से पहले सरकार के प्रमुख विभागों से मंजूरी लेना जरूरी होगा, जिससे भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता आएगी और वर्तमान कर्मचारियों के हितों की रक्षा होगी।
उपनल कर्मचारियों को मिली बड़ी राहत
लंबे समय से उपनल कर्मचारी मांग कर रहे थे कि जिन पदों पर वे नियुक्त हैं, उन पदों को ‘फ्रीज’ रखा जाए ताकि सीधी भर्ती के कारण उनकी सेवा प्रभावित न हो। सरकार के इस फैसले को उपनल कर्मियों की एक बड़ी जीत के रूप में देखा जा रहा है। इससे न केवल उनकी नौकरी सुरक्षित होगी, बल्कि उन्हें भविष्य को लेकर मानसिक शांति भी मिलेगी।
हाईकोर्ट के आदेश का कड़ाई से पालन
यह आदेश पूरी तरह से कानूनी बाध्यता के तहत जारी किया गया है। सभी विभागों को चेतावनी दी गई है कि वे इन निर्देशों का सख्ती से पालन करें। यदि कोई विभाग बिना अनुमति के भर्ती प्रक्रिया शुरू करता है, तो उसे अवैध माना जाएगा। इस कदम से राज्य सरकार ने यह संदेश दिया है कि वह संविदा और उपनल पर कार्यरत कर्मचारियों के रोजगार की सुरक्षा के प्रति गंभीर है।

