AIIMS ऋषिकेश की बड़ी लापरवाही: मरीज को दर्ज किया ‘HIV पॉजिटिव’, अब ब्याज समेत चुकाना होगा मुआवजा

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देहरादून। ऋषिकेश एम्स को पूरी तरह स्वस्थ व्यक्ति को गलत तरीके से ‘एचआईवी पॉजिटिव’ दर्ज करने के चर्चित मामले में बड़ा कानूनी झटका लगा है। उत्तराखंड राज्य उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग ने हरिद्वार जिला उपभोक्ता आयोग के फैसले को पूरी तरह बरकरार रखते हुए एम्स प्रबंधन की अपील खारिज कर दी है। राज्य आयोग ने एम्स को निर्देश दिया है कि वह पीड़ित व्यक्ति को 50 हजार रुपये जुर्माना और 10 हजार रुपये वाद व्यय के रूप में चुकाए, जिस पर 6 प्रतिशत सालाना ब्याज भी देना होगा।

राज्य उपभोक्ता आयोग की अध्यक्ष जस्टिस कुमकुम रानी और सदस्य सीएम सिंह की पीठ ने 17 अगस्त 2026 को यह महत्वपूर्ण निर्णय सुनाया। पीठ ने मामले की समीक्षा करते हुए स्पष्ट किया कि हरिद्वार जिला आयोग द्वारा सुनाए गए फैसले में कोई कानूनी त्रुटि या कमी नहीं है, जिसके आधार पर उसमें हस्तक्षेप किया जाए। इस आदेश के बाद अब एम्स को पीड़ित को पूरी मुआवजा राशि ब्याज सहित देनी होगी।

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यह पूरा मामला हरिद्वार निवासी नसीम अली से जुड़ा है, जिन्हें 15 जुलाई 2014 को इलाज के लिए ऋषिकेश एम्स में भर्ती कराया गया था। पीड़ित का आरोप है कि अगले दिन 16 जुलाई 2014 को डिस्चार्ज करते समय एम्स के डॉक्टर ने उनके मेडिकल रिकॉर्ड में ‘एचआईवी पॉजिटिव’ दर्ज कर दिया। एम्स की इस रिपोर्ट को देखकर मरीज और उनका परिवार गहरे मानसिक तनाव व सदमे में आ गया था।

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एम्स की रिपोर्ट पर संशय होने पर नसीम अली ने देहरादून स्थित श्री गुरु राम राय इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एंड हेल्थ साइंसेज तथा श्री महंत इंदिरेश अस्पताल में दोबारा अपनी जांच कराई। दोनों प्रमुख चिकित्सा संस्थानों की जांच रिपोर्ट में स्पष्ट हुआ कि वे पूरी तरह से ‘एचआईवी नेगेटिव’ हैं और एम्स द्वारा दी गई रिपोर्ट पूरी तरह गलत व भ्रामक थी।

चिकित्सकीय लापरवाही के इस मामले को लेकर पीड़ित नसीम अली ने हरिद्वार जिला उपभोक्ता आयोग का दरवाजा खटखटाया था। जिला आयोग ने 22 अप्रैल 2019 को अपना फैसला सुनाते हुए ऋषिकेश एम्स को गंभीर लापरवाही और कोताही का दोषी माना था तथा पीड़ित को मुआवजा देने का आदेश जारी किया था।

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जिला आयोग के इस दंडात्मक आदेश के खिलाफ ऋषिकेश एम्स प्रबंधन ने राज्य उपभोक्ता आयोग में अपील दायर कर राहत की गुहार लगाई थी। हालांकि, लंबी सुनवाई और साक्ष्यों के अवलोकन के बाद राज्य आयोग ने एम्स की दलीलों को खारिज कर दिया। यह फैसला चिकित्सा क्षेत्र में लापरवाही के मामलों में एक सख्त नजीर के रूप में देखा जा रहा है।

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