देहरादून। हिमालयी क्षेत्र के भीतर भारी मात्रा में भूगर्भीय ऊर्जा जमा है, जिसके चलते उत्तराखंड में कभी भी 1803 जैसा विनाशकारी भूकंप आ सकता है। ऋषिकेश में श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय के कुलपति और प्रसिद्ध भूगर्भ विज्ञानी प्रो. एके महाजन ने यह चेतावनी जारी की है।
1 सितंबर 1803 को गढ़वाल हिमालय में आए 8.1 तीव्रता के ऐतिहासिक भूकंप का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि यह क्षेत्र आज भी बेहद संवेदनशील है। इस वैज्ञानिक चेतावनी का सीधा असर प्रदेश के शहरों, पर्यटन स्थलों और ढांचागत परियोजनाओं पर पड़ता है।
वैज्ञानिकों और इतिहासकारों के लिए 1803 का गढ़वाल भूकंप दो शताब्दियों बाद भी अध्ययन का प्रमुख विषय बना हुआ है। आधुनिक अध्ययनों में इसकी तीव्रता 7.3 से 8.1 एमडब्ल्यू आंकी गई है, जबकि वर्ष 2023 के एक विशेष शोध में इसे 8.1 एमडब्ल्यू का माना गया था। 1 सितंबर 1803 को आए इस भीषण भूकंप के तीव्र झटके पंजाब से लेकर बंगाल तक महसूस किए गए थे।
वर्ष 1803 के इस भूकंप ने गढ़वाल हिमालय में भारी तबाही मचाई थी। तब गढ़वाल की राजधानी रहे श्रीनगर में 500 से 1,000 मकान ध्वस्त हो गए थे और पूरा शहर मलबे में तब्दील हो गया था। इसके अलावा उत्तरकाशी के बाड़ाहाट में 200 से 300 लोगों की मौत दर्ज की गई थी। इस तबाही का असर दिल्ली तक पहुंचा था, जहां ऐतिहासिक कुतुब मीनार का ऊपरी हिस्सा क्षतिग्रस्त हो गया था और मैदानी इलाकों में जमीन पर दरारें आ गई थीं।
भूगर्भ विज्ञानी प्रो. एके महाजन के अनुसार, उस दौर में आधुनिक उपकरण न होने के कारण इसके सटीक केंद्र को लेकर वैज्ञानिकों में आज भी मतभेद हैं। हालांकि उन्होंने स्पष्ट किया कि 1803 का भूकंप केवल इतिहास का पन्ना नहीं, बल्कि वर्तमान हिमालय की भूगर्भीय संवेदनशीलता की सबसे बड़ी चेतावनी है। शांत दिखने वाले हिमालय के भीतर जमा ऊर्जा कभी भी बड़े भूकंप का रूप ले सकती है।
प्रो. महाजन ने बताया कि आज जहां उत्तराखंड के बड़े शहर, हाईवे और इंफ्रास्ट्रक्चर विकसित हो चुके हैं, वहां अतीत के भूकंपों का अध्ययन भविष्य के खतरों को समझने के लिए जरूरी है। इसी जोखिम को देखते हुए श्रीदेव सुमन विश्वविद्यालय वर्ष 2027 से जिला आपदा प्रबंधन विभाग के साथ मिलकर इस त्रासदी की याद में विशेष अभियान चलाएगा। इसका मकसद आम लोगों को भूकंपरोधी निर्माण और नदियों के किनारे निर्माण से बचाव के प्रति जागरूक करना है।

