रेखा आर्य के लिए कांग्रेस के पास संवेदनाओं का सैलाब, दीप्ति रावत के मामले में क्यों सूख गई हमदर्दी….?

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महिला सम्मान की बात करने वाली कांग्रेस का दोहरा रवैया चर्चा में, रेखा आर्य के निजी मामले पर खुलकर समर्थन और दीप्ति रावत के वीडियो पर नेताओं की चुप्पी ने खड़े किए सवाल

देहरादून। राजनीति में विचारधारा के साथ-साथ सुविधा का भी बड़ा महत्व होता है। मुद्दा अगर विरोधी खेमे का हो तो संवेदनाएं उमड़ पड़ती हैं, बयान जारी होने लगते हैं और महिला सम्मान की दुहाई दी जाने लगती है। लेकिन जब वैसा ही मामला अपने ही राजनीतिक कुनबे से जुड़ जाए तो अचानक सुर बदल जाते हैं। फिर वही नेता निजी जिंदगी, पारिवारिक विवाद और व्यक्तिगत मामलों की दुहाई देकर किनारा करते दिखाई देते हैं। उत्तराखंड की सियासत में इन दिनों कुछ ऐसा ही सवाल कांग्रेस के सामने खड़ा हो रहा है।

बीते दिनों कैबिनेट मंत्री रेखा आर्य का एक वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया था। वीडियो में वह अपने निजी जीवन से जुड़ी परेशानियों को साझा करती नजर आईं। मामला सामने आते ही कांग्रेस नेताओं ने इसे हाथोंहाथ लिया। महिला होने के नाते रेखा आर्य के साथ खड़े होने और उन्हें समर्थन देने की बातें कही गईं। कांग्रेस नेताओं की ओर से महिला सम्मान और उनके अधिकारों को लेकर संवेदनशीलता भी दिखाई गई। उस समय भाजपा की ओर से इसे निजी मामला बताकर राजनीतिक टिप्पणी से बचने का रुख सामने आया। लेकिन अब कहानी का दूसरा पक्ष भी सामने है।

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पूर्व कैबिनेट मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता हरक सिंह रावत की पत्नी दीप्ति रावत ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी किया। इस वीडियो के सामने आने के बाद उम्मीद की जा रही थी कि महिला सम्मान की बात करने वाले कांग्रेस नेता उसी संवेदनशीलता के साथ उनके पक्ष को भी खड़े होंगे, जिस तरह रेखा आर्य के मामले में सामने आये थे। मगर यहां तस्वीर कुछ अलग नजर आई।

कांग्रेस के कई नेताओं ने इस पूरे घटनाक्रम को हरक सिंह रावत और उनके परिवार का निजी मामला बताते हुए टिप्पणी से दूरी बना ली। यहीं से सवाल खड़ा होता है कि आखिर महिला सम्मान का पैमाना तय करने का अधिकार किसके पास है? क्या महिला के साथ खड़े होने का फैसला उसकी राजनीतिक पहचान देखकर किया जाएगा? क्या रेखा आर्य भाजपा में हैं, इसलिए उनके मामले में कांग्रेस को महिला सम्मान का मुद्दा दिखाई दिया और दीप्ति रावत कांग्रेस के वरिष्ठ नेता की पत्नी हैं, इसलिए उनके मामले में निजी जिंदगी की दुहाई देना सुविधाजनक हो गया?

दरअसल, रेखा आर्य के मामले में कांग्रेस नेताओं ने भी सार्वजनिक रूप से संवेदना जताई थी। उन्होंने कहा था कि एक महिला के तौर पर रेखा आर्य का दर्द महसूस किया जा सकता है। वहीं दीप्ति रावत के मामले में सामने आए घटनाक्रम में उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी पहचान और परिवार की प्रतिष्ठा को लेकर आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा है कि गलत प्रचार से उनका परिवार मानसिक पीड़ा से गुजर रहा है और वह न्यायालय की शरण लेंगी।

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यहां सवाल यह नहीं है कि दोनों मामलों की परिस्थितियां बिल्कुल एक जैसी हैं या नहीं। दोनों के अपने अलग तथ्य और कानूनी पहलू हैं। सवाल कांग्रेस की राजनीतिक संवेदनशीलता और उसके सार्वजनिक बयानों की निरंतरता का है। यदि किसी महिला की पीड़ा पर आवाज उठाना पार्टी का सिद्धांत है तो उस सिद्धांत की कसौटी पर अपने और पराये का फर्क क्यों होना चाहिए?

कांग्रेस अक्सर भाजपा सरकार को महिला सुरक्षा, महिला सम्मान और महिलाओं के अधिकारों के मुद्दे पर घेरती रही है। ऐसे में पार्टी के लिए यह भी जरूरी हो जाता है कि उसके नेताओं का व्यवहार उसके सार्वजनिक दावों से मेल खाए। महिला सम्मान कोई ऐसा राजनीतिक हथियार नहीं हो सकता जिसे विरोधियों के खिलाफ तो पूरी ताकत से इस्तेमाल किया जाए, लेकिन अपने खेमे में मामला पहुंचते ही उसे निजी बताकर किनारे रख दिया जाए।

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हरक सिंह रावत कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं में शामिल हैं। उनकी पत्नी दीप्ति रावत की अपनी राजनीतिक और सार्वजनिक पहचान भी रही है। ऐसे में उनके वीडियो पर पार्टी नेताओं की प्रतिक्रिया को लेकर सवाल उठना स्वाभाविक है। क्या कांग्रेस के पास उनके पक्ष को सुनने और तथ्यों को समझने का वक्त नहीं था? क्या महिला के सम्मान और प्रतिष्ठा से जुड़ा मामला केवल तभी सार्वजनिक सरोकार बनता है, जब उससे सत्तारूढ़ दल को घेरने का अवसर मिले?

राजनीति में आरोप-प्रत्यारोप अपनी जगह हैं। किसी भी विवाद में जांच, तथ्य और कानून का अपना महत्व है। लेकिन सार्वजनिक जीवन में महिलाओं के सम्मान की बात करने वाले राजनीतिक दलों से यह अपेक्षा जरूर रहती है कि उनका रवैया परिस्थितियों और राजनीतिक पहचान के हिसाब से न बदले।

अब सत्ता में बैठे लोग कांग्रेस से सीधा सवाल कर रहे है कि रेखा आर्य के मामले में महिला सम्मान का जो पैमाना तय किया गया था, क्या वही पैमाना दीप्ति रावत के मामले में भी लागू होगा? या फिर कांग्रेस की संवेदनाएं भी राजनीतिक चश्मा लगाकर ही जागती हैं? क्योंकि महिला सम्मान का नारा लगाने और उस पर अमल करने के बीच का अंतर जनता भी देखती है और समझती भी है।